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कल्पनाएं एवं उद्देश्य

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                                                    कल्पनाओं की उड़ान बहुत ऊँची हो सकती है परन्तु वास्तविक जीवन का बुलबुला एक अचंभित स्वप्न की भांति होता है जिसमे स्वप्न देखने वाले एवं स्वप्न में आने वाले दोनों को ही बोध नहीं होता है कि दोनों कहाँ किस स्थिति में हैं। मैं इस बात को भली भांति समझ सकता हूँ कि इसका भावार्थ समझ पाना थोड़ा मुश्किल है परन्तु यदि आप इसे कुछ समय निरंतर पढ़ते हैं तो यह आपकी समझ में भी आएगा और यह आपके जीवन से सम्बन्ध भी रखता होगा।                                       आज के समय में जिन समस्याओं के साथ हम लोग जीवन व्यतीत कर रहे हैं यह समस्याएं हमारे द्वारा ही निर्मित हैं।  जब भी हम अपने भूत को देखेंगे और उसका चिंतन करेंगे तो यह समझना बहुत आसान हो जायेगा कि कौन सी समस्या का जन्म कहाँ हुआ हमारे हर एक कर्म का प्रभाव हमारे आने वाले भविष्य में अवश...

अब नी करा पलायन (Poem)(भाषा गढ़वाली)

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  बचपन खूब छौ मेरु  सभी सच्चा दगड़्या  वखि छा, निर्भगी ह्वेगी जवानी मेरी अब सिर्फ पेंसा ही पेंसा ह्वेयुं चा, नि रौंदा  हम यन  जुगत माँ,  नि पोड़दा तब तैं उमर माँ,  त रौंदा  हम आज वीं माटी माँ, वी सुबेर माँ वी बिनसिर माँ,  कख हर्चि होला उ दिन, उ रात भी आज कखि नि चा,  उ पहाड़ भी कखि नि छन, व रस्याण भी कखि नि चा,  कख होलु मौसी कु गौं कु बाठु, कख व हरियाली हर्चि  चा,  कख होला उ दगड़्या जो रोन्दी दा भी हँसे देंदा छा, और हेसन माँ लोड जांदा छा, उ प्यार अजक्याल रयुं नि कखि, ना यु संसार उइ चा, चला प्यारों फिर वखि चलदान जख बटी सुरुवात कई चा,  व ख़ुशी कखि नी च दगड्यों जु पहाड़ों माँ समाई चा,  नि होलु इथ्गा पेंसा पर ख़ुशी त तब भी  वखि चा,  बिन्सरी माँ उठी की, सिन्कोली नींद त औंदी चा , घोर उबरों माँ कम से कम ठण्ड त रोंदी चा, गुठ्यार भी तनी होया होला तिबारी भी घिसी सी,  चला प्यारों आंदा इबरी   तो सब्युं  लिपी की,  आज नी  त भोल जान सब्युन वखि च,  अबेर किलै कन्न तब जब प्राण हमरु वखि च, ...

मेरा दर्द मेरी तन्हाई (Poem)

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    तुम और मैं याद  है कहाँ मिले थे,  कहाँ हमने वो अनकहे से एहसास, एक दूजे से कहे थे,  तुम थोड़ी शर्मायी सी थी मैं थोड़ा घबराया सा था,   फिर भी ना  जाने क्यों तुम पर, बहुत प्यार आया था,  भीगी सी थी मेरी ऑंखें तुमने भी खूब साथ दिया,  कन्धा जो  तुमने आगे  किया, तुम्हे  तो भीगना ही था,  उस सर्दी की रात में  अश्रु तुम पर बरसा कर,   रो रो कर पागल था मैं और तुम चुप करवा कर,  ना  उस दिन कोई चाँद दिखा ना  तारे  थे  शायद, तन्हाइयों में  वक़्त बिताने के यही फायदे थे शायद,  तुम ना  होती तो अश्रु धारा निकलती नहीं,  जितनी बर्फ दिल में  जमी थी वो पिघलती नहीं,  बोझ खुद की गलतियों का लिए घूमता हर जगह,  अश्रु बहने से दर्द, चलो कुछ कम तो हुआ,  यूँ ही आ जाया कर कभी कभी इस मैल को धोने के लिए ,  जहर जो बन रहा है दिल में , उसमे प्यार के बीज बोने के लिए ,  तुझसे दूर होना भी जरुरी है मेरे लिए,  हर पल पास रखूँगा तो रौनक कहाँ होगी चेहरे में, दर्द तो बस तुझे दिखता...

रक्षात्मक या आक्रामक

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                                                                    अनुभव से प्राप्त ज्ञान आवश्यक नहीं कि स्वयं के अनुभवों से ही ग्रहण किया जाये कभी कभी हम यह सब दूसरों के अनुभवों से भी ग्रहण कर सकते हैं।  सामान्यतः हमारे आस पास ऐसी घटनाएं घटती हैं जिनका हमसे सम्बन्ध नहीं होता परन्तु वह हमें कुछ ना कुछ सिखा देती हैं अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उन सब से क्या सीख पाते हैं। आज का समय बहुत व्यस्त होने के साथ साथ बहुमुखी प्रतिभावान होने का भी है परन्तु हम इसमें लगातार निष्क्रिय होते चले जा रहें हैं स्वाभाविक है कि यह सब हमारी आदतों में हो रहे बदलावों की भिनंता एवं तीव्र तरह से बदलते हमारे निर्णयों का परिणाम है।  देखा जाये तो हमारा व्यव्हार आक्रामक एवं कार्य रक्षात्मक हैं जबकि हमें  इसके विपरीत होना चाहिए।  हमारे कार्य आक्रामक एवं व्यव्हार रक्षात्मक होना चाहिए।           ...

बन ताकत खुद की खुद से (Poem)

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  रख संघर्ष को अपनी मुठ्ठी में , बन ताकत खुद की खुद से , बन हक़ीक़त इस दुनिया की , नाम रोशन जहाँ में कर दे , न यकीन कर दुनिया पर , खुद को ही हक़ीक़त समझ ले , जो अतीत हो गया है उसको , अपने जीवन का अनुभव समझ ले , बन दुनिया का वो सितारा यहाँ , जिसकी तलाश सब करते हैं , उड़ना चाहो तो उड़ जाओ बस , इरादे थोड़ा मजबूत कर ले , ये आसमा भी तुम्हारा है , ये ज़मीन भी तुम्हारी है , ये समंदर भी तुम्हारा है और , ये लहरे भी तुम्हारी है , रख संघर्ष को अपनी मुठ्ठी में , बन ताकत खुद की खुद से। ना दर्द कोई यूँ दे सकता , ना कोई यूँ ही हमें सह सकता, ना परवाह कर इस जहाँ की अब , चल कहीं दूर जहाँ सुकून हो बस, तू उठ वहां से अब, जहाँ तू गिरा है , मजिल है तेरी लेकिन, सपना बिखरा है , संभल अब देर ना कर उसे पाने में,  ना सोच अब पल भर भी पैर ज़माने में , जो गिर कर संभलेगा खुद, वही यहाँ महाराणा होगा , घास की रोटी खा कर भी, विजय पताका फहराना होगा , ना कर विश्वास,  समय  को लुटाने में , रख संघर्ष को अब, अपनी मुठ्ठी में ,

संगठन और ज्ञान

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                                                                संगठन और ज्ञान दो बहुत बड़ी शक्तियां हैं जिनका सामान्यतः हमें बहुत अनुभव के बाद बोध होता है।  आजकल की सामाजिक एवं मानसिक व्यवस्थाओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि हमारा पतन ही हमारी अज्ञानता एवं परस्पर द्वेष है।  हमने अपने मस्तिष्क को विकसित होने से रोककर उन कार्य कलापों की तरफ अग्रसर कर लिया है जहाँ से पतन का होना सुनिश्चित है।  ताकतवर वही है जो संगठित है जो संगठित है वही शक्तिमान है और जो शक्तिमान है उसी का अस्तित्व है।   हम किसी बात को उतना ही समझ पाते हैं जितना हमारा बुद्धि का विकास हुआ हो या जितना हमें ज्ञान हो।  कुछ बातों को समझने का प्रयास हम जीवन पर्यन्त करते हैं परन्तु कभी कभी हम उन बातों को समझ ही नहीं पाते और यह इसलिए होता हैं क्यूंकि  उस बात को समझने हेतु हम उतना गहन अध्ययन नहीं करते या उसके लिए हम उतनी गहराई से नहीं सोचत...

मैं धरना प्रदर्शन हूँ। (Poem)

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मैं राजनितिक गलियारे से पैदा हुआ एक  ऐसा हथियार हूँ  जो यदा कदा अपने उद्द्देश्यों को परिवर्तित करता हूँ।  सामाजिक भावनाओं का मजाक बना राजनीती मैं करता हूँ  कभी विरोध करने की तीव्र इच्छा तो  कभी समर्थन करता हूँ ।   थाली का बैंगन हूँ साहब कहीं भी पलट सकता हूँ  मैं धरना प्रदर्शन हूँ मैं कुछ भी कर सकता हूँ।                                        न कोई रोक है मुझे यहाँ, न ही किसी से डरता हूँ।  मैं वो हूँ, जो कह देता हूँ वो करता हूँ।   समाज को साथ लेकर फलता फूलता हूँ और फिर उसी समाज का विरोध करता हूँ।   स्वयं को फलीभूत करता  हुआ आज मैं  तीव्रगामी दर्द  निवारक से तुलना करता हूँ  मैं मन चाहा रूप बदल सकता हूँ।  आंसू बहा कर लोगों के सामने  कमरे में जाकर हँसता हूँ  मैं धरना प्रदर्शन हूँ साहब मैं कुछ भी कर सकता हूँ।  राजनीती है मोह हमारा नेताओं की बात करता हूँ  बहुत बनाये नेता  यहाँ इंसा...