संदेश

दिसंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अब नी करा पलायन (Poem)(भाषा गढ़वाली)

चित्र
  बचपन खूब छौ मेरु  सभी सच्चा दगड़्या  वखि छा, निर्भगी ह्वेगी जवानी मेरी अब सिर्फ पेंसा ही पेंसा ह्वेयुं चा, नि रौंदा  हम यन  जुगत माँ,  नि पोड़दा तब तैं उमर माँ,  त रौंदा  हम आज वीं माटी माँ, वी सुबेर माँ वी बिनसिर माँ,  कख हर्चि होला उ दिन, उ रात भी आज कखि नि चा,  उ पहाड़ भी कखि नि छन, व रस्याण भी कखि नि चा,  कख होलु मौसी कु गौं कु बाठु, कख व हरियाली हर्चि  चा,  कख होला उ दगड़्या जो रोन्दी दा भी हँसे देंदा छा, और हेसन माँ लोड जांदा छा, उ प्यार अजक्याल रयुं नि कखि, ना यु संसार उइ चा, चला प्यारों फिर वखि चलदान जख बटी सुरुवात कई चा,  व ख़ुशी कखि नी च दगड्यों जु पहाड़ों माँ समाई चा,  नि होलु इथ्गा पेंसा पर ख़ुशी त तब भी  वखि चा,  बिन्सरी माँ उठी की, सिन्कोली नींद त औंदी चा , घोर उबरों माँ कम से कम ठण्ड त रोंदी चा, गुठ्यार भी तनी होया होला तिबारी भी घिसी सी,  चला प्यारों आंदा इबरी   तो सब्युं  लिपी की,  आज नी  त भोल जान सब्युन वखि च,  अबेर किलै कन्न तब जब प्राण हमरु वखि च, ...

मेरा दर्द मेरी तन्हाई (Poem)

चित्र
    तुम और मैं याद  है कहाँ मिले थे,  कहाँ हमने वो अनकहे से एहसास, एक दूजे से कहे थे,  तुम थोड़ी शर्मायी सी थी मैं थोड़ा घबराया सा था,   फिर भी ना  जाने क्यों तुम पर, बहुत प्यार आया था,  भीगी सी थी मेरी ऑंखें तुमने भी खूब साथ दिया,  कन्धा जो  तुमने आगे  किया, तुम्हे  तो भीगना ही था,  उस सर्दी की रात में  अश्रु तुम पर बरसा कर,   रो रो कर पागल था मैं और तुम चुप करवा कर,  ना  उस दिन कोई चाँद दिखा ना  तारे  थे  शायद, तन्हाइयों में  वक़्त बिताने के यही फायदे थे शायद,  तुम ना  होती तो अश्रु धारा निकलती नहीं,  जितनी बर्फ दिल में  जमी थी वो पिघलती नहीं,  बोझ खुद की गलतियों का लिए घूमता हर जगह,  अश्रु बहने से दर्द, चलो कुछ कम तो हुआ,  यूँ ही आ जाया कर कभी कभी इस मैल को धोने के लिए ,  जहर जो बन रहा है दिल में , उसमे प्यार के बीज बोने के लिए ,  तुझसे दूर होना भी जरुरी है मेरे लिए,  हर पल पास रखूँगा तो रौनक कहाँ होगी चेहरे में, दर्द तो बस तुझे दिखता...