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उलझा जीवन गहरा सार

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                                  जीवन ऐसी पहेली बनता जा रहा था जिसे समझने की कोशिश करते हुए भी नहीं समझ पा रहा था।  दर्द जीवन में आते हैं या हम स्वयं उन्हें पैदा करते हैं यह सुनिश्चित करना इस समय असंभव सा प्रतीत हो रहा था।  दर्द जीवन में निरंतर रहे तो आदत हो जाती है परन्तु दर्द अपनों को हो तो घुटन बनने लगता है।  अपनी पीड़ा को सहना अत्यंत सरल है परन्तु अपनों पर आयी विपदा आपको चैन नहीं आने देती।  पीड़ा का रहस्य एक संवेदनशील विषय है शायद इसको कोई भी अनुभव नहीं करना चाहेगा परन्तु यह जीवन का अभिन्न अंग भी है इससे दूर कोई जा भी नहीं सकता। यह अगर इतना बड़ा सत्य है तो इसकी विवेचना हम अपने दैनिक जीवन में क्यों नहीं करते हैं ? क्यों हम अपने जीवन के इतने महत्वपूर्ण अंग पर स्वयं ही आंकलन करने से डरते हैं?                                  मानव निर्मित भौतिक सुविधाएँ एवं वस्तुओं के प्रति अपार प्रेम हमें स्वार्थी...

अनकहे पल (Poem)

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  लिखता था कभी खुद के लिए।  आज सब कुछ पीछे छूट गया उसके लिए।  वो ना समझा है ना समझेगा कभी,  कितने लोगों ने किये समर्पण उसके लिए।  एकांत एक माध्यम है खुद को समझने का, उसको कभी ऐसा  एकांत मिला ही कहाँ।  घिरा रहता है हर दम वो खुद की महत्वकांक्षाओं के लिए।  उसको कहाँ पता कितने लोगों ने समर्पण किये उसके लिए।   रक्त  अश्रु तक समाहित आँखों में, उसकी ख़ुशी के लिए।  पूरा जीवन न्योछावर कर दिया उसकी एक एक ख्वाइश के लिए।  समझना होता तो वो समझ जाता अब तक, हमारे दिलों में कितना है उसके लिए।  बचपन  सिखाया उसने, उसने ही तो साथ दिया।  आज अचानक क्यों उसने, यूँ  सबका प्रतिकार किया, जो संघर्षरत है उसके लिए, उसने उसी को मार  दिया। द्वेष है ये या, दिखावे का ज्वर उमड़ रहा।  सबको दिख रहा, क्या उसको नहीं दिख रहा।  एकांत उमड़ रहा बाँहों में, कल्पना मात्र है राहों में , चित परिचित सब बिछड़ रहें हैं, इस जीवन की राहों में , अब सम्भलना मजबूरी है, यही समय जरुरी है।  रिश्तों से यदि प्यार है तो उनका सम्मान जरुरी है।...