उलझा जीवन गहरा सार
जीवन ऐसी पहेली बनता जा रहा था जिसे समझने की कोशिश करते हुए भी नहीं समझ पा रहा था। दर्द जीवन में आते हैं या हम स्वयं उन्हें पैदा करते हैं यह सुनिश्चित करना इस समय असंभव सा प्रतीत हो रहा था। दर्द जीवन में निरंतर रहे तो आदत हो जाती है परन्तु दर्द अपनों को हो तो घुटन बनने लगता है। अपनी पीड़ा को सहना अत्यंत सरल है परन्तु अपनों पर आयी विपदा आपको चैन नहीं आने देती। पीड़ा का रहस्य एक संवेदनशील विषय है शायद इसको कोई भी अनुभव नहीं करना चाहेगा परन्तु यह जीवन का अभिन्न अंग भी है इससे दूर कोई जा भी नहीं सकता। यह अगर इतना बड़ा सत्य है तो इसकी विवेचना हम अपने दैनिक जीवन में क्यों नहीं करते हैं ? क्यों हम अपने जीवन के इतने महत्वपूर्ण अंग पर स्वयं ही आंकलन करने से डरते हैं? मानव निर्मित भौतिक सुविधाएँ एवं वस्तुओं के प्रति अपार प्रेम हमें स्वार्थी...