अनकहे पल (Poem)



 लिखता था कभी खुद के लिए। 

आज सब कुछ पीछे छूट गया उसके लिए। 

वो ना समझा है ना समझेगा कभी, 

कितने लोगों ने किये समर्पण उसके लिए। 

एकांत एक माध्यम है खुद को समझने का,

उसको कभी ऐसा  एकांत मिला ही कहाँ। 

घिरा रहता है हर दम वो खुद की महत्वकांक्षाओं के लिए। 

उसको कहाँ पता कितने लोगों ने समर्पण किये उसके लिए।  

रक्त  अश्रु तक समाहित आँखों में, उसकी ख़ुशी के लिए। 

पूरा जीवन न्योछावर कर दिया उसकी एक एक ख्वाइश के लिए। 

समझना होता तो वो समझ जाता अब तक,

हमारे दिलों में कितना है उसके लिए। 

बचपन  सिखाया उसने, उसने ही तो साथ दिया। 

आज अचानक क्यों उसने, यूँ  सबका प्रतिकार किया,

जो संघर्षरत है उसके लिए, उसने उसी को मार  दिया।

द्वेष है ये या, दिखावे का ज्वर उमड़ रहा। 

सबको दिख रहा, क्या उसको नहीं दिख रहा। 

एकांत उमड़ रहा बाँहों में, कल्पना मात्र है राहों में ,

चित परिचित सब बिछड़ रहें हैं,

इस जीवन की राहों में ,

अब सम्भलना मजबूरी है, यही समय जरुरी है। 

रिश्तों से यदि प्यार है तो उनका सम्मान जरुरी है। 

ना  सम्मान हुआ  उसका तो, साथ रहना मजबूरी है। 

तुम अपने कदम चलो और हम अपने चले,

यह अब बहुत जरुरी है ,

रिश्तों का कोई मोल नहीं होता,

तुम फिर भी कीमत लगा चुके हो। 

ना दर्द तुम सहो अब ना हमें सहना है ,

दूरियों  के साथ ही दोनों को खुश रहना है।

जितने मजबूर तुम हो दुनियां में ,

उतने ही हम भी हो चुके ,

साथ देते देते बेमन से एक दूजे का ,

कितना ही हम सह लिए। 

चलो आज एक नयी दुनियां में ,

जहाँ तुम्हारे मालिक तुम रहो ,

ना साथ ले चलो अब वहां हमें ,

खुद से खुद को समझने दो। 

जन्म लिया था साथ निभाने के लिए ,

शायद रिश्ते कि मौत आयी है ,

दफ़न करो अब हमारी  दुनिया को ,

नयी ज़िंदगी रंग लायी है ,


तुम रंगों अपने सपनो को शायद हम ही उनके लायक नहीं,

तुम करो तरक्की सीढ़ियां बना कर हममे अब वो ताकत नहीं। 

नीरस हुई है ज़िंदगी लेकिन नीरस मेरे विचार  नहीं ,

इतने काबिल हो गए हैं हम, कि खुद पर अब हम भार नहीं।

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