मन चेतना और मंदिर

 

मन  चेतना और मंदिर

 

सर्वप्रथम इसको समझने की कोशिश करते हैं कि मन  चेतना और मंदिर तीनो एक साथ आते हैं तो इसका भावार्थ किस सन्दर्भ में है   मन हमारी मानसिक स्थिति  को दर्शाता है जो कि सबसे पहला पड़ाव है इसके बाद चेतना यह दर्शाता है की मन किस अवस्था में है कह सकते हैं कि हमारी किसी वस्तु जीव या प्रकृति की किसी भी चीज़ के लिए  सोच हमारी चेतना है।  अपने आस  पास के तत्वों का बोध होना उन्हें समझने तथा उनकी बातों का मूल्यांकन करने की शक्ति  का नाम चेतना है।  भारतीय वेद, शास्त्र एवं सभ्यता के अनुसार अगर देखा जाये तो चेतना को आध्यात्म के साथ ही समझा जा सकता है कह सकते हैं कि सारे ब्रह्माण्ड में जो परम शक्ति व्याप्त है जो कि प्रकृति के कण कण में विध्यमान  है उसको ही चेतना कहते है।  हमारा  शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है और पांच तत्वों में ही विलीन हो जाता है ये मैं बहुत समय से सुनता रहा हूँ और इसका सही भावार्थ यदि समझना है तो हमें चेतना और आध्यात्म को समझना होगा जिसके विषय में मैं अपने अनुभव आपसे अवश्य साँझा करूँगा।  अब हम मंदिर के विषय को समझते हैं मंदिर वह स्थान है जहाँ सकारात्मक ऊर्जा को एकत्र करने हेतु कई प्रकार के यंत्रों को एकत्रित  करके बनाया गया है इसके कुछ उदारहरण के लिए  आप कह सकते हैं कि मंदिर में पुजारी जो मंत्रोचारण करते हैं उससे उत्पन्न होने वाले कम्पन,  घंटे से उत्पन्न कम्पन एवं वहां बनाया गया वातावरण एक सकारात्मक ऊर्जा को जन्म देता है जिससे हम आध्यात्म से जुड़ कर अपने अवचेतन  मन को उस दिशा में निर्देश देते हैं जहाँ  हम स्वयं होना चाहते हैं। कोई भी ऐंसा स्थल जो हमारे मन को सकारात्मक ऊर्जा की तरफ प्रेरित करता हो वह हमारे अवचेतन मन को उस दिशा हेतु निर्देश दे सकता है जिसको हम प्रायोजित करना चाहते हैं अतः इन तीनों को एक साथ लाना हमारे लिए पूर्ण रूप से अनिवार्य है मंदिर एवं कोई भी अन्य प्रार्थना स्थल हमारी चेतना को संयमित रखते हैं और हमारी चेतना हमारे मन को स्थिर रखने का काम करती है।

 

विषय की आवश्यकता

 

इस विषय को लिखने  का मूल कारण यह है कि आजकल हम सब कहीं ना कहीं परेशान हैं कह सकते हैं कि हम सबमे मनोविकार हैं।  यह आजकल सबके लिए एक ऐंसी समस्या का रूप लेता जा रहा जिससे हमारे कार्यों के साथ साथ हमारे जीवन पर भी गहरा प्रभाव  हो रहा है।  हम लोग उस दिशा में बढ़ते चले जा रहे हैं जिनसे हमारे जीवन में अकारण  ही समस्याएं उत्पन्न  होती चली जा रही है।  अब हमें गहराई से सोचना पड़ेगा कि  क्या हम वो जीवन जी रहे जिसकी हम कल्पना करते हैं निशन्देह  सबका जबाब ही ना में होगा क्यूंकि  कल्पनाओं को साकार करने हेतु हमे अपने जीवन में बहुत सारे  बदलाव की आवश्यकता  है जिसके लिए हम तैयार नहीं सच कहूं तो हमें बचपन से इस पर कार्यरत होना चाहिए लेकिन हम ना ही इसको अपने जीवन में ही  बदल पाते  हैं ना ही अपने बच्चों को इसके लिए तैयार कर पाते हैं और हम निरंतर ही मानसिक अवसाद में लिप्त  होते चले जा रहे हैं। 

 

हमें स्वयं पर कार्य  करने की आवश्यकता है उसके लिए अपने अवचेतन मन को तैयार कर उसमे ये चेतना जगानी होगी कि जो भी हम करें वो दृढ निश्चय से करें जो कि  छल कपट एवं स्वार्थ से परे हो।  मैंने अधिकतर अनुभव  किया है कि जब भी मैं कोई कार्य दूसरों के लिए करता हूँ जिस कार्य में दूसरे का हित जुड़ा हो और उस कार्य से मेरा कोई स्वार्थ ना हो तो उस कार्य में बहुत कम बाधाएं  आती हैं और वो कार्य सफल हो जाता है परन्तु इसके विपरीत जिस कार्य  को मैं अपने स्वार्थ  के लिए करता हूँ  वो कार्य इतनी आसानी से सफल नही  होता और कह सकते हैं वहां सफलता हाथ नही  लगती। 

काम , क्रोध ,लोभ , ईर्ष्या, मोह, मद, चिंता, उद्देग, भय, विषाद, दैन्य इन सब भावनाओं के साथ किये गए कार्य में कभी सफलता प्राप्त  नहीं होती अपितु उससे उत्पन परिस्थितियों से हम मानसिक अवसाद की तरफ अग्रसर होते हैं।  हम स्वयं ही अपना मार्ग उस मानसिक अवसाद की तरफ लेकर चले जाते हैं और ये हम कभी समझ नहीं पाते। इसके निवारण हेतु हमें स्वयं को उन परिस्थितियों में सामान भाव से सोचने की जरुरत है जो हमारे द्वारा उत्पन की गयी हैं।

 

चेतना मनुष्य के चरित्र का वास्तविक रूप भी हैं।  चेतना और चरित्र किसी की व्यक्तिगत सम्पति नहीं हो सकती।  यह बहुत समय का कठिन परिश्रम एवं सामाजिक सकारात्मक व्यवहार का परिणाम होता है।  प्रत्येक व्यक्ति अपने बड़ों से इन गुणों का समायोजन करते हुए वंशानुगत इसका पालन करता एवं करवाता है।  यह एक ऐंसी प्रक्रिया है जिसे हम पैतृक सम्पति के रूप में प्राप्त करते है और सामाजिक परिवेश में इसका विस्तार कर अपनी  पैतृक सम्पति का परिचय देते हैं अर्थात मनुष्य चेतनायुक्त प्राणी है जिससे वह किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणाम को सोच समझ लेने की क्षमता रखता है।  हमारे साथ घट  रही प्रिय और अप्रिय घटना का हम पर क्रमशः अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है यदि  दोनों स्थिति में अनुकूल प्रभाव पड़ता है तो वह हमारी चेतना का सकारात्मक होना दर्शाता है। सकारात्मकता चरित्र का निर्माण करती है, चरित्र हमारा सामाजिक विस्तार करता है , सामाजिक विस्तार हमें अनुशासित एवं क्रमबद्ध होना सिखाता है, अनुशासन एवं क्रमबद्ध हमे उदारवादी सफल मनुष्य बनाते हैं और उदारवादी सफल मनुष्य सदैव ही सबके लिए प्रेरणाश्रोत होते हैं।

 

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो मानव में उपस्थित वह तत्व जिसके  कारण  उसे सभी प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं जैंसे कि देखना, सुनना और उन विषयों पर चिंतन करना दुःख सुख की अनुभूति करना और उसके  कारण  किसी भी प्रकार का निश्चय करना एवं किसी वस्तु एवं पदार्थों को प्राप्त करने की चेष्ठा करते हैं।

 

चेतना को तीन भागो में रखा गया है चेतन, अवचेतन और अचेतन। चेतन  वो होता है जिसमे हम सोचते समझते हैं और उसके अनुसार कार्य करते हैं जो हमें वर्तमान में उपस्थित रखता एवं  उसके अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा देता है। अवचेतन वो होता है जिसमे उसी पल हेतु सूचनाएं जाती हैं  परन्तु स्मरण  नहीं रहती।  इन सूचनाओं को हम स्मरण  करने की कोशिश करें तो स्मरण की जा सकती हैं।  अब अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारा अवचेतन मस्तिष्क कितना शक्तिशाली है।  इसे उपयोग में लाकर हम चेतन  मस्तिष्क  को वो संकेत दे सकते जो हम करना चाहते हैं एवं इसी के सहयोग से उन  भावनाओं का संग्रह कर सकते हैं जो हमारे लिए आवश्यक हों।  अब आते हैं अचेतन पर ये वो अवस्था है जहाँ हमें कुछ भी स्मरण नहीं होता वो  सब क्रियाएं जो हम भूल चुके हैं वो अचेतन कहलाती हैं और आवश्यकता पड़ने पर इन्हे  विभिन प्रकार से स्मरण करवाया  जा सकता है। जो आज हमारी चेतना है कल वह अवचेतना एवं अचेतन  का अंश हो सकते हैं । 

 

हमारी चेतना हमारा सामाजिक परिवेश, हमारे द्वारा पढ़ा गया लिखा गया सुना गया एवं हमारे आस पास के वातावरण में विकसित होती है उस प्रत्येक घटना का जो हमारे साथ हर क्षण होती है वो हमारी चेतना एवं अवचेतना  का रूप लेती हैं। इसी सामाजिक परिवेश के प्रभाव में मनुष्य नैतिकता , व्यवहारकुशलता ,वेदना , संवेदना , विचार एवं हममें उत्पन्न हर भाव  का जन्म होता है।  चेतना के विकास की चरम सीमा निज स्वतंत्रता का अनुभव करवाती है परन्तु वह सामाजिक परिवेश को प्रभावित कर सकती है या स्वयं उन बातों से प्रभावित हो सकती है या इस प्रभाव से अलग भी रह सकती है यह उस समय की परिस्थिति एवं आपकी सोच पर निर्भर करता है।

 

अब इसका विश्लेषण करते हैं हमारी चेतना हमारा सामजिक परिवेश निर्धारित करता है और हमारी अवचेतना को हमारी चेतना निर्धारित करती है।  जब इतनी शक्ति ईश्वर ने हमें प्रदान की है तो हम स्वयं को वहां क्यों नहीं पाते जहाँ हमें होना चाहिए?  इसका सबसे बड़ा कारण है हमारा सामजिक परिवेश।  अतः अपने सामाजिक परिवेश को उस अनुरूप बनाइये जो आप स्वयं करना चाहते हैं।  ऐंसे लोगों से मिलिए उनके साथ बातें कीजिये उस विषय पर अध्ययन कीजिये उस विषय को अपने जीवन का एक ऐंसा महत्त्व पूर्ण अंग बनाइए जिसके बिना आप रह ही ना पाएं।  उसको अपने जीवन का अभिन्न अंग बना कर जियें और अपने बच्चों को भी ये बातें आज से ही समझाना शुरू करें।  सकारात्मक विषयों पर चर्चा करें सकारात्मक परिवेश बनाने की हर संभव कोशिश करें आध्यात्म से जुड़ें और मन को चेतना एवं चेतना को मंदिर बनायें।

 

 

 

       आशीष भट्ट

मार्केटिंग  मैंनेजर -सेलब्लेस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड

सदस्य -शिवालिक उत्तरांचल विकास समिति 

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