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आज का दर्द कोरोना (Poem)

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  शब्द हैं लेकिन फिर भी निशब्द हूँ  कोरोना के आतंक से व्यथित  हूँ , जो न देखा इतने सालो में, वो आज देख कर स्तब्ध हूँ,  न जीवन का भरोसा यहाँ न मौत की परिभाषा है,  आज इंसान यहाँ जीवन के लिए लड़ रहा  है  , संघर्ष के लिए खड़ा है हर कोई सांसों के बिना पड़ा है,  मरते हुए को बचाने  की बेबसी है , आँखों के सामने जलते जंगलों की तस्वीर खड़ी है , न रोते हम यूँ न आज ये तस्वीर बनती ऐंसी,  बस चारों तरफ छायी  सिर्फ बेबसी ही बेबसी,  इंसान हैं  जिन्दा लेकिन शमशान कम पड़ रहे, चिताओं को जलाने के भी आज  टोकन मिल रहे, मर कर भी आज यहाँ इंसान की बेकद्री है, लाश उठाने के लिए भी चार कन्धों की कमी है ,   न कर इतना अहंकार आज अपनी कमायी का,  यहाँ तो व्यापार चल रहा लाशों से उगाई  का , मर गया तो क्या साथ लेकर जायेगा,  जो कमाया है सब यहीं रह जायेगा , मत फेर मुँह उनसे जिनको तू मानता  है,  कर मद्दद उसकी जिसको तू जनता है,  न घबरा न शर्मा न डर आज तू , बढ़ चल मदद के लिए जिनकी आस है तू , आज के बाद भी यूँ न खाली ...