संगठन और ज्ञान
संगठन और ज्ञान दो बहुत बड़ी शक्तियां हैं जिनका सामान्यतः हमें बहुत अनुभव के बाद बोध होता है। आजकल की सामाजिक एवं मानसिक व्यवस्थाओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि हमारा पतन ही हमारी अज्ञानता एवं परस्पर द्वेष है। हमने अपने मस्तिष्क को विकसित होने से रोककर उन कार्य कलापों की तरफ अग्रसर कर लिया है जहाँ से पतन का होना सुनिश्चित है। ताकतवर वही है जो संगठित है जो संगठित है वही शक्तिमान है और जो शक्तिमान है उसी का अस्तित्व है। हम किसी बात को उतना ही समझ पाते हैं जितना हमारा बुद्धि का विकास हुआ हो या जितना हमें ज्ञान हो। कुछ बातों को समझने का प्रयास हम जीवन पर्यन्त करते हैं परन्तु कभी कभी हम उन बातों को समझ ही नहीं पाते और यह इसलिए होता हैं क्यूंकि उस बात को समझने हेतु हम उतना गहन अध्ययन नहीं करते या उसके लिए हम उतनी गहराई से नहीं सोचत...