प्रेम और साधना
प्रेम एक विषय नहीं यह एक साधना है। सामान्यतः देखा गया है कि प्रेम को कोई भी परिभाषित नहीं कर पाता क्यूंकि प्रेम परिभाषित करने हेतु शब्दों की नहीं भावनाओं कि आवश्यकता होती है। हमारा सम्पूर्ण जीवन प्रेम पर आधारित है कहूं तो हमारी उत्पत्ति ही प्रेम से हुई है। प्रेम जीवन का सारांश है। हमारा जीवन प्रेम से उत्पन्न हुआ प्रेम से ही अग्रसर है और प्रेम पर ही समाप्त हो जाता है। प्रेम भावनाओं का ऐसा संयोजन है जिसे हम बिना संकोच के व्यक्त कर देते हैं। आपके फ़ोन से आप प्रेम करते हैं अब मान लीजिये वह फ़ोन आपके हाथ से गिर जाता है तो उस समय उसके लिए भावनाओं का जो समायोजन आपके ह्रदय में होगा वही प्रेम है। आज के युग में आपके चलंत दूरभाष यंत्र (फ़ोन) से अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता। हम प्रेम के भाव को कहीं भी समझ सकते हैं प्रकृति द्वारा निर्मित हर जीव से हमें प्रेम हो सकता है और प्रकृति द्वारा निर्मित हर जीव हमसे ...