२६ जनवरी २०२१

                     आज मैं बहुत भारी दिल से यह लेख लिख रहा हूँ।  कह सकता हूँ की आज आँखों में खून दौड़ रहा है।  आज २६ जनवरी २०२१ इसे  देश के लिए काला  दिन भी कह सकता हूँ।  हमारी मानसिकता इतनी क्षीण हो गयी गयी है कि हम अपने देश के स्वाभिमान को भी जिन्दा नहीं रख पा रहे। सही में मुझे आज अपने लेखों पर गर्व है कि मैं मानसिक स्थिति को सही करने हेतु लेख लिख रहा हूँ उनसे कितने परिवर्तन आएंगे नहीं जानता, लिख इसलिए रहा हूँ कि सच में मुझे लगने लगा है कि हम सब मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गए हैं।  हम अपने स्वार्थों की पूर्ती के लिए मनुष्य से जानवर बनने में भी कदाचित नहीं हिचक रहे। हम आज की घटना पर सरकार की असफलता  के लिए हंस रहे हैं छी घृणा हो रही आज मुझे ये सब देख कर कि कुछ लोग सिर्फ इसलिए हिंसा कर रहें हैं कि उन्हें सरकार का विरोध करना है।  क्या यह  संस्कृति और सभ्यता  हमारी है नहीं कभी नहीं यह हमारी नहीं यह पडोशी देशों कि सभ्यता रही है जो हमारे यहाँ कहाँ से आयी ?  क्या इस सभ्यता को यहाँ प्रवेश करवाया जा रहा है ? 


मैंने सुना बहुत था कि दूसरों कि प्रगति से ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है लेकिन आज प्रतय्क्ष देख पा रहा हूँ।  आज हम प्रगतिशील हैं और हमारे देश  में यह सब करवाकर जा रहा है क्या यह प्रायोजित सोच का कारण है?


                 आज लालकिले को अपने अधीन लेना वहां तिरंगा ध्वज को अपमानित करना यह वो लोग नहीं हो सकते जो यहाँ की संस्कृति एवं सभ्यता में पले बढे हैं।  निश्चित ही इनकी संस्कृति को या तो लालच ने परिवर्तित कर दिया या यह इस देश के ही नहीं।  मैंने अपने जीवन में विपक्षी पार्टियों के बहुत विरोध देखें है लेकिन सी ए ए और किसान  बिल जैसा विरोध प्रदर्शन न कभी देखा न ही देखना चाहता हू।  आज लाल किले पर जो घटना हुए वह मात्र सरकार का विरोध नहीं इस देश वासियों को सीधी चेतावनी  थी कि हम सदैव देश विरोधी कार्य ही करेंगे देखते हैं  कौन हमें रोकता है।  सरकारों के विरोध पहले भी हुए १९८५   से लेकर अब तक हर एक विरोध को मैंने अपने अपनी आँखों से देखा है  लेकिन इतना अत्याचार मैंने कभी नहीं देखा।  पहले मैंने सरकारों को मनमानी करते देखा है आज में प्रजा को मनमानी करते देख रहा हूँ।  यहाँ गलत का विरोध नहीं होता सही का विरोध होता है क्यूंकि हम सोये हैं। वर्षों से सोये होने के कारण आज हम यह सब देख रहें हैं।  मैंने कश्मीर पंडितों का विश्थापन भी देखा मैंने कर सेवकों पर गोलियां भी देखी मैंने उत्तराखंड आंदोलन पर गोलियां और अस्मिता लूटा जाना भी देखा मैंने  हर वो सरकार  की मनमानी देखी जिसका विरोध होना चाहिए था लेकिन मुझे शर्म आती है हम तब भी सोये थे आज भी सोये हैं हमने तब भी गलत होते विषयों का विरोध नहीं किया और आज भी वही स्थिति है।   क्या यह विरोध तब की मनमानी के खिलाफ नहीं होने चाहिए थे या फिर आज सरकार को गोलियां चलवा कर अपनी सत्ता का घमंड दिखाना चाहिए था ? आज हमारे देश को जानते बुझते उस स्थिति में लाया जा रहा कि हमारी बढ़ती अर्थव्यवस्था को रोका जा सके।  सरकार यदि किसानो पर पहले लाठियां चलवाती तो भी सरकार गलत होती नहीं चलवाई तो भी आज वही गलत है जबकि सचाई यह की सोये इंसानो को गलतियां निकालनी ही आ सकती है।  उठो जागो और जो सही है उसका समर्थन करो।  सोकर जीवन गुजारने से सही है कि देश के लिए लड़ कर मृत्यु आ जाये।  मैं अपने पुलिस कर्मियों एवं हर उस सुरक्षा टुकड़ी का अभिवादन करता हूँ जिन्होंने इतना संयम रखा एवं यह साबित किया यह सरकार  गोलीकांड वाली सरकार नहीं है।


                           हम लालच और अपने अल्पज्ञान में इतने मदमस्त हो गए हैं कि सही और गलत की पहचान करना ही भूल गए हैं  या हमें आनंद आने लगा है दूसरों को गलत कह कर अपनी जिम्मेदारिओं से पीछा छुड़ाने में।  हम इतने कमजोर हो गए हैं कि कोई भी आकर हमारी मातृभूमि को ललकारे और हम कायरों की भांति अपने घरों में घुस कर बैठे रहें।  क्या सुरक्षा का दायित्व केवल सरकारों या सुरक्षा कर्मियों का ही है हमारी नहीं।  हम यह भी नहीं देख पाते कि जिस राकेश टिकैत के पिता इस बिल के जीवन भर लड़े वही राकेश इसका विरोध कर रहा है।  क्या हमने अपनी  मासिकता को इतना संकीर्ण कर लिया है कि सिर्फ अपने परिवार तक सीमित हो गए हैं।  नहीं हम इतने बुरे नहीं हो सकते जागो और अपने हित के लिए लड़ो सब मिलकर लड़ो।  जो आज हुआ उस पर वो लोग जरूर हंस सकते हैं जो स्वार्थ से प्रेरित होंगे लेकिन उन लोगों को अवश्य गुस्सा आएगा जो देश के लिए सोचते हैं।  सरकार के गलत कार्यों का विरोध आवश्यक हैं परन्तु कभी कभी परिस्थितियां सरकार को साथ होने का एहसास करवाने की होती है यह वही समय है।  सरकार के साथ खड़े होकर अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज करवाएं।  आश्चर्य कि कई  लोग सरकार के विरोध में इतने पागल हो गए हैं की देश की सम्पति लूटने वालों को सही ठहराने लगें हैं और आज की घटना पर अपनी हंसी नियंत्रित  नहीं कर पा रहे।  मैं शर्मिंदा हूँ  कि हमारे तिरंगे का अपमान हुआ, मैं शर्मिंदा हूँ कि खालिस्तान और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे , मैं शर्मिंदा हूँ कि  आज गणतंत्र दिवस के उप्लक्ष में देश विरोधी तत्वों ने हमारे स्वाभिमान को लाल किले ललकारा।  यह हमारी कायरता को दर्शाता है लेकिन अब हमें यह कायरता त्याग कर इनके लिए विरोध करना होगा नहीं तो आने वाले स्वर्णिम वषों को नहीं देख पाएंगे।  आप सभी से अनुरोध है कि आज की घटना को जीवन भर स्मरण रख कर समय समय पर ऐसे  तत्वों का विरोध करें एवं इनको देश से बाहर कर देश की स्वतंत्रता को आजीवन बनायें रखने में सहयोग करें।   


आशीष भट्ट 

मार्केटिंग मैनेजर - सेलब्लेस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड 

सदस्य - शिवालिक उत्तरांचल विकास समिति 


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