अनुभव और चिंतन

                 



                           जीवन के बहुत सारे  अनुभव करने के पश्यात मात्र कुछ  ही बातें  समझ आती हैं अगर आपने  सकारात्मक ऊर्जा के साथ कार्य किये हैं तो सदैव ही आपके जीवन में एक उमंग एवं जीने की अभिलाषा बनी रहती है। प्रत्येक दिन एक अच्छा काम करें प्रत्येक दिन ईश्वर को अवश्य  स्मरण करें। अपने माता पिता दोनों को ही आदर एवं उनकी सेवा करें।  किसी और के लिए अपनी दिनचर्या एवं अपने स्वार्थ हेतु किसी का दिन नष्ट ना करें। जीवन बहुत उपयोगी है इसका हर क्षण उपयोग में लाएं।  अपने हर क्षण को सदैव व्यवस्थित एवं क्रियाशील रखें।  वो कार्य करें जिसको करने के पश्यात आनंद की अनुभूति होती हो।  नई नई बातों को सीखने का प्रयास करें। ज्ञान अर्जित करें एवं सकारात्मक दृष्टिकोण बनाये रखें।  यथासंभव प्रयास करें कि स्वयं पर नियन्त्र रख अपनी बातों को समझने हेतु आपके व्यव्हार में नम्रता एवं सम्मान का भाव हो।  आपके मन एवं मस्तिष्क में बुरे विचार समायोजित न हों। अपनी त्रुटियों  पर चिंतन अवश्य करें एवं उनमें सकारात्मक सुधार हेतु स्वयं को प्रयासरत करें।  त्रुटि सभी लोग करते हैं परन्तु जो उन त्रुटियों से शिक्षित होते हैं और पुनः उन त्रुटियों को नहीं करते वही बुद्धिमान कहलाते हैं। यह संभव नहीं कि किसी व्यक्ति से त्रुटि ना हो  परन्तु वही त्रुटि पुनः ना हो यह संभव बनाया जा सकता है।  अपने अनुभवों से  सदैव ही लाभ अर्जित करें उनको व्यर्थ न जाने दें।  अपनी अच्छी बुरी परिस्थिति पर सामान रूप से प्रतिक्रिया करें अत्यधिक ख़ुशी एवं अत्यधिक दुःख हमें सदैव त्रुटियां करने पर विवश करता है इसलिए सदैव अपनी भावनाओं को  इन दोनों परिस्थितियों में नियंत्रित रखें। सफलता इतनी आसान नहीं है इसे पाने हेतु जीवन में बहुत परिवर्तन की आवश्यकता होती है अतः हमें परिवर्तन कर ये सुनिश्चित करना होगा कि किये गए परिवर्तनों का लाभ हम अर्जित कर पा रहे या नहीं। 


                          मैंने जितने भी सफल मनुष्यों के बारे में पढ़ा है उन सबमे कुछ विशेषताएं ऐंसी पायी कि मुझे प्रतीत हुआ कि उन्होंने स्वयं कि चेतना को अंतर्ज्ञान  (अंतरात्मा ) के रूप में विकसित किया। इन लोगों ने स्वयं को कहीं न कहीं अध्यात्म से जोड़ने का  प्रयास  किया  है अपनी उन आदतों पर कार्य किया है जिनसे इनमे सकारात्मक ऊर्जा का संचयन हो सके ।  उन्होंने अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल बनाने हेतु बहुत परिश्रम किये और अपने दैनिक सामाजिक व्यव्हार को उस ओर अग्रसित किया जिससे उनमे धैर्य उत्पन्न हो सके।  दैनिक कार्यों में कुछ जो समान था वो सुबह जल्दी उठना , योग प्राणायाम करना , सकारात्मक पुस्तकों का अध्ययन करना।  सभी सफल लोगों ने खुद के स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य एवं अपनी व्यव्हार कुशलता पर अच्छा  काम किया यह  मैंने सबमे समानरूप से देखा।  इन्होने अपनी सफलता को अच्छा समय दिया और आज भी ये लोग विपरीत परिस्थिति में भी संयम बनाये रखते हैं। 


                            इनके बारे में बताने का कारण यही है कि यदि हम अपनी मानसिक और शारीरिक अवस्था पर कार्यरत हों तो हम हर विपरीत परिस्थिति में भी अनुकूल एवं व्यवहारित रह सकते हैं अर्थात हम नियंत्रित रह सकते हैं। गीता का एक श्लोक इसके लिए प्रेणादायक है जो कि निम्नवत है। 


कर्मण्येवाधिकरस्ते माँ फलेषु कदाचनः। 

माँ कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि। 


                         कृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि हे पार्थ तू कर्म कर फल कि इच्छा मत रख।  इसलिए कर्म फल के लिए मत करो और ना ही कर्म के फल पर बंधन रखो। 


                                     कर्म पर हम अधिकार कर सकते हैं लेकिन फल पर नहीं। यदि हम फल कि इच्छा रखते हैं तो उससे हमारे कर्म पर नहीं फल पर ध्यान केंद्रित होता है और हम अपने कर्म से भटक जाते हैं।  हमारा ध्यान हमारे कर्म पर होना चाहिए।  उन परिस्थितितयों में कृष्ण भगवान् ने अर्जुन के लिए जो कहा वो उन्होंने समझा और अपना धनुष उठाया परन्तु आज के संदर्भ में देखा जाये तो हमारी चेष्टा कर्म से अधिक फल पर होती है इसीलिए हम वहां नहीं होते जहाँ हमें होना चाहिए। 


                                         अब इसको आज के सन्दर्भ में यदि देखा जाये तो गरीब, अनपढ़, असहाय , इन सब नकारात्मक शब्दों की अत्यधिकता हो गयी है जिससे हम स्वयं का इन शब्दों के स्तर से आंकलन करते है जबकि यह अनुचित है।  हमें स्वयं पर कार्य करके अपने जीवन को अच्छा चरितार्थ , परोपकारी , सभ्य एवं सांस्कृतिक बनाने हेतु प्रयासरत होना चाहिए।  हमारी आज की सबसे बड़ी समस्या हमारे मन में अकारण ही उत्पन्न हो रहे गलत भाव एवं नकारात्मक शब्दों के प्रति हमारा आकर्षण हैं जिसके  कारण  हममे ईष्या, द्वेष, क्रोध, भय, मोह, माया एवं ऐंसी भावनाओं का विस्तार होता जा रहा कि हम स्वयं ही स्वयं को मानसिक  क्षति पंहुचा रहे हैं। आज हम अपने जीवन में प्रेम की अनुभूति तक नहीं कर पा रहे हैं क्यूंकि हमने  प्रेम शब्द को भी समझना छोड़  दिया है।  ये सब कुछ हमने अपने स्वार्थ के लिए प्रायोजित किया है जिसका परिणाम आज बहुत भयावह दिखाई दे रहा है।  यह एक बहुत विस्तृत विषय है इस पर अपने अगले लेख पर चर्चा करूँगा क्यूंकि यह भी आजकल मानसिक अवसाद का बहुत बड़ा कारण बनता जा रहा है। 


                           आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास करता हूँ कि मेरे जीवन के इन अनुभवों से आपके जीवन में थोड़े भी सकारात्मक परिवर्तन आते हैं तो यह मेरे लिए गौरवान्वित करने  वाली बात होगी। आप लोगों का आशीर्वाद एवं प्यार मुझे  आपकी टिप्पणी द्वारा प्राप्त होता रहे।  किसी भी गलत शब्दावली एवं अन्य गलती के लिए आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। 

 

आपके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की मंगल कामना के साथ 


आशीष भट्ट 

मार्केटिन मैनेजर - सेलब्लेस हैल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड। 

सदस्य - शिवालिक उत्तरांचल विकास समिति।  

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