चरित्र और व्यक्तित्व

 


                                    चरित्र मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रकट करता है। यह दोनों सामानांतर हैं।  जितना उत्तम व्यक्ति का चरित्र होगा उतना ही उत्तम उसका व्यक्तित्व।  आज विज्ञानं बहुत प्रगतिशील है परन्तु इसके पश्यात भी कुछ बातें इंसान में ऐंसी है जिसका विश्लेषण करने हेतु कोई प्रयोगशाला नहीं बना पाया।  हम अपने शरीर को अनेकानेक प्रकार कि जांचों से उसकी स्थिति का आंकलन  तो कर सकते हैं परन्तु भावनाओं हेतु ऐंसा कुछ भी नहीं।  व्यक्तित्व का  निर्माण हमारी भावनाओं एवं हमारी शिक्षा पर निर्भर करता है।  हमारे शिक्षकों एवं अभिभावकों  द्वारा प्रदान ज्ञान हमारी भावनाओं को सही दिशा प्रदान करता है और वह हमारे व्यक्तित्व को बनता  है परन्तु चरित्र का निर्माण हम स्वयं करते हैं  व्यव्हार हमें पैतृक सम्पति के रूप मैं मिल सकता है परन्तु चरित्र का निर्माण इंसान को स्वयं करना पड़ता  है।  आज के समय में यह सत्य है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्यूंकि  मैंने आज शिक्षकों एवं अभिभावकों को भी उन बातों को नजरअंदाज करते देखा है जिनसे व्यक्तित्व बनता है ।  मैं अगर सही शब्दों में इसका व्याख्या करूँ तो कह सकता हूँ कि अगर हमें चरित्र निर्माण करना है तो स्वयं जागृत होना होगा। हम अपने चरित्र को परिपक्व बनायें इसके लिए दृढ निश्चय स्वयं करना होगा।  हम गलतियां करते हैं जिसका आभास हम स्वयं करते हैं कई बार तो गलतियों को किसी दूसरे से बताने में भी हिचकते हैं अतः जिन गलतियों को हम करते हैं उसके लिए चिंतन करना उसमे सुधार करना इन बातों का उत्तरदायित्व हमारा हो जाता है। 


                               अपनी अंतरात्मा को समझो।  आपने यह कई बार सुना होगा कई बार पढ़ा  भी होगा।  हर वो चीज जो हमारे अंदर सकारात्म परिवर्तन कर सकती है वह हमारी अंतरात्मा ही है।  हमारे चरित्र का निर्माण  भी हमारी अंतरात्मा से होता है  इसलिए इस पर कार्यरत रहे और इसको बिना बिलम्ब शुद्धता कि ओर अग्रसर करें। 


                               हमारा चरित्र हमारे जीवन में सफलता एवं असफलता की बहुत बड़ी कुंजी है।  चरित्र का गलत होना हमें हीन भावना का रोगी बना सकता है।  इसमें हम अपनी इच्छाओं को चरम सीमा तक सोचते हैं और उस प्रकार से न होने पर हमारी भावनाओं को गहरा आघात लगता है जिसका परिणाम हमें मानसिक एवं शारीरिक  कष्ट के रूप में  भुगतना पड़ता है। हम दिन रात उसी विषय पर विचार करते हैं वही सब बातें हमारे चेतन एवं अवचेतन मस्तिष्क पर सदैव विराजमान होती हैं जिससे हमारी कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।  प्रेम करना अपराध नहीं है लेकिन आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु प्रेम करना आपको स्वयं की दृष्टि में अपराधी बना देता है। आपकी आवश्यकताएं दिनोदिन बढ़ती चली जाती हैं और आप उन आवश्यक्ताओं के आधीन होते चले जाते हैं।  शारीरिक आवश्यकता आपको मानसिक अपराधी बनाती है और आप इसे प्रेम समझते हैं जबकि सच यह है कि यह आपके चरित्र का हनन करती हैं।  यदि आपकी आवश्यकता प्रेम हो तो आपके चरित्र का निर्माण संभव है यदि आपकी आवश्यकता शारीरिक है और उसे आपने  प्रेम का नाम दिया है तो आपको  मानसिक एवं शारीरिक हानि होनी निश्चित है इसलिए अपने चरित्र का निर्माण कर अपने व्यक्तित्व को अपनी अंतरात्मा के अनुरूप बनायें।  सामाजिक दृटिकोण इन सब विषयों पर अलग अलग हो सकते हैं इसलिए अपनी अंतरात्मा को समझे एवं उसके अनुरूप अपने चरित्र का निर्माण करें।  


                            अपनी अंतरात्मा को शुद्धता प्रदान करने हेतु आध्यात्म सबसे उत्तम है इसलिए सर्वप्रथम स्वयं की आदतों में थोड़ा थोड़ा उचित परिवर्तन कर इस कार्य को प्रारम्भ करें।  प्रातःकाल जल्दी उठना , योग प्राणायाम करना , महापुरुषों द्वारा कहे गए ज्ञान को पढ़ना एवं इन सब  बातों  का पालन करना।  परिवर्तन एक साथ नहीं आते इसलिए धैर्य बनायें रखें धीरे धीरे आपको यह सब परिवर्तन आपके जीवन में एक नयी सुबह की किरण लेकर आएंगे। आप मानसिक तनावों से दूर होकर एक सुखद जीवन की ओर अग्रसर होंगे यह मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ। 


आपके अच्छे चरित्र एवं आपके व्यक्तित्व कि मंगल कामना के साथ 



आशीष भट्ट 

मार्केटिंग मैनेजर - सेलब्लेस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड 

सदस्य - शिवालिक उत्तरांचल विकास समिति 

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