संगठन और ज्ञान

                          




                                    संगठन और ज्ञान दो बहुत बड़ी शक्तियां हैं जिनका सामान्यतः हमें बहुत अनुभव के बाद बोध होता है।  आजकल की सामाजिक एवं मानसिक व्यवस्थाओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि हमारा पतन ही हमारी अज्ञानता एवं परस्पर द्वेष है।  हमने अपने मस्तिष्क को विकसित होने से रोककर उन कार्य कलापों की तरफ अग्रसर कर लिया है जहाँ से पतन का होना सुनिश्चित है।  ताकतवर वही है जो संगठित है जो संगठित है वही शक्तिमान है और जो शक्तिमान है उसी का अस्तित्व है।  हम किसी बात को उतना ही समझ पाते हैं जितना हमारा बुद्धि का विकास हुआ हो या जितना हमें ज्ञान हो।  कुछ बातों को समझने का प्रयास हम जीवन पर्यन्त करते हैं परन्तु कभी कभी हम उन बातों को समझ ही नहीं पाते और यह इसलिए होता हैं क्यूंकि  उस बात को समझने हेतु हम उतना गहन अध्ययन नहीं करते या उसके लिए हम उतनी गहराई से नहीं सोचते।  विषय जीवन मे बहुत होते हैं परन्तु हम उन विषयों को अधिकतर अपने जीवन में महत्ता नहीं देते जिनसे हम परेशान या फिर मेहनत करनी पड़े। हम सामाजिक परिवेश के अंतर्गत अपने कार्यों को निर्देशित करते हैं परन्तु जिन कार्यों में थोड़ी सी कठिनाई आती हैं वहां हम  समर्पण कर देते हैं जिससे परिणाम हमारे विपरीत होते हैं और हम उसके लिए किसी और को उत्तरदायी समझ लेते हैं। 

                        स्वयं के साथ विपरीत परिस्थियों के लिए सदैव ही दूसरों पर दोष रखना यही हमारी सबसे बड़ी मूर्खता हैं और यही एक मात्र कारण भी हैं कि हम संगठित नहीं हैं। एक उदाहरण से समझते हैं हमारी परीक्षा के उपरांत हमारे कम आये हुए प्रतिशत को हमने किसी न किसी रूप में एक दोषी अवश्य ढूंढा होगा कि थोड़ा मुश्किल प्रश्न पत्र था या यह हमें पढ़ाया ही नहीं गया ऐसे बहुत सारे बहाने हम सब के पास ही रहे होंगे ( जिनके प्रतिशत अच्छे थे कृपया मेरी बातों को दिल पर न लें ) परन्तु यदि हम स्वयं की सत्यता तभी स्वीकार कर लेते तो आने वाले परिणाम अत्यधिक सुखद होते। जब हम स्वयं के सत्य से आत्मसाध हो जाते हैं तो निश्चित ही हमारे अंदर सकारात्मक परिवर्तन आते हैं जो हमें ज्ञानी और संगठित करते हैं। 

      सर्वे भवन्तु सुखिनः।  

        सर्वे सन्तु निरामयाः।  

          सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।  

                  माँ कश्चित् दुःख भगभवेत। 

                  ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 

                          सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी का जीवन मंगल मय हो कोई भी दुखी न रहे, ऐसा हमें वर दें। 

                                        यदि हम  ऐसी संस्कृति और सभ्यता से हैं जहाँ विश्व कल्याण हेतु हम सदैव प्रार्थी रहे हैं तो फिर हमारा संगठन और हमारी संस्कृति का इतनी तेज़ पतन क्यों हुआ ?  क्या पूरा विश्व एक दूसरे का कल्याण नहीं सोचता ? क्या हमने अपनी संस्कृति और सभ्यता का प्रचार और उसमे छुपे परोपकार का सही ढंग से प्रस्तुतीकरण नहीं किया ? क्या हम स्वयं को महान कहलाये जाने के लिए अपनी संस्कृति का उपयोग मात्र करते हैं ?क्या हमने यह शिक्षा अपने आने वाली पीढ़ियों को दी हैं या पिछली पीढ़ी हमें यह सीखा कर गयी हैं ? 


                                    ऐसे प्रश्नो कि बहुत लम्बी सूची हो सकती हैं क्यूंकि आज के समय में प्रश्न ही बाकी रह गए हैं। जहाँ भी नज़र दौड़ाइए बस ताकतवर बनने की होड़ लगी हैं कोई  अपना वर्चश्व बढ़ाने, तो कोई अपना अस्तित्व बचाने में लगा हैं।  इंसान यहाँ इंसान कहाँ रह गया अपने स्वार्थों की पूर्ती हेतु पत्थर बन गया हैं। सबको ही सर्वशक्तिमान बन कर विश्व पर राज करना हैं और इसके लिए सब कुछ कर भी सकता हैं चाहे इंसानियत का खून ही क्यों न हो।  सर्वशक्तिमान बन कर सभी राज तो करना चाहते हैं परन्तु विश्व परोपकार की भावनाएं लगफग समाप्त हो चुकी हैं। आज कुछ बड़े प्रश्नो में यह एक प्रश्न कि विश्व कल्याण हेतु कौन कौन देश अपना सहयोग दे सकते हैं और कौन कौन हैं जो सर्व जन कल्याण हेतु कार्यरत हैं  ?  

                                         अपने देश की बात करूँ तो यहाँ सब जातिवादी जैसी समस्याओं में उलझे हुए हैं।  जातिवादी भंवर का खत्म होना मानो किसी स्वप्न की तरह हैं।  इसके मूल में अगर जाएँ तो कौन इसका उत्तरदायी हैं इसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल कार्य हैं क्यूंकि इस दलदल को बनाने में दोनों की अहम् भूमिका हैं।  जब एक पक्ष आरक्षण लेना हो तो अपनी जाती बताते हुए संकुचित नहीं होता और जब किसी पर गुस्सा करना हो तो जातिवादी टिपण्णी करते हुए दूसरा पक्ष संकुचित नहीं होता तो गलत सही का आंकलन करना बेईमानी हो जाती हैं इसका अर्थ तो हैं कि दोनों ही इस विवाद से निकलना नहीं चाहते।  यहाँ हम अगर स्वार्थी होने का दावा करें तो यह गलत नहीं होगा हम सब अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं जहाँ हमारा फायदा होता हैं हम उसको करने में हम थोड़ा भी नहीं सोचते कि इसके दूरगामी क्या परिणाम होंगे।  हम सब जानते हैं कि जातिगत टिप्पणियां गलत हैं फिर भी कोई समझना नहीं चाहता और हम सब यह भी जानते हैं कि आरक्षण का आज के समय के अनुकूल आधार  आर्थिक होना चाहिए यह भी नहीं समझना चाहते।  इन्ही सब में  उलझ कर सही और गलत का अनुमान एवं विश्व स्तर पर अपनी संस्कृति और सभ्यता का सही प्रस्तुतीकरण एवं संगठित नहीं हो  पा रहे।  

                                 इसी श्रंखला में दूसरा सबसे बड़ा कारण हमारा अज्ञान है हमने ईश्वर के मामलों में भी स्वयं को विभाजित कर लिया है कोई कहता है ईश्वर निराकार है कोई कहता है साकार है कोई कहता है कि मैं ही ईश्वर हूँ परन्तु सही में जो ज्ञानी हैं और इन विषयों पर ज्ञान दे सकते हैं उन्होंने स्वयं को समाज से दूर कर ईश्वर के चरणों में स्थान ले लिया हैऔर इसके लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं क्यूंकि हमने अपने स्वार्थ हेतु समाज को विभिन्न स्तरों पर विभाजित कर लिया है। हमें सही ज्ञान और सही दिशा निर्देश वेद शास्त्रों की  बातें दे सकती हैं और हम उन्ही से अनभिज्ञ हैं अतः इन्हे जीवन का प्रमुख आधार बना कर इनकी सकारात्मकता से जुड़े एवं अध्ययन के साथ साथ इनका पालन भी करें यही सत्य एवं सुगम मार्ग है।  

                             संगठित एवं ज्ञानी समाज एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करते हैं जो कल्पनाओं से भी परे हो इसलिए जातिवादी परस्पर द्वेष हमारा वही हाल करेगा जो मुगलों अंग्रेजों और आज के सन्दर्भ में तालिबान ने किया है। शिक्षा के साथ साथ उन धार्मिक अध्ययनों को अवश्य करें जो धर्म के साथ साथ आपको विश्व स्तर पर ख्याति एवं आपकी सांस्कृतिक पहचान दिला सके। 

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