उलझा जीवन गहरा सार
जीवन ऐसी पहेली बनता जा रहा था जिसे समझने की कोशिश करते हुए भी नहीं समझ पा रहा था। दर्द जीवन में आते हैं या हम स्वयं उन्हें पैदा करते हैं यह सुनिश्चित करना इस समय असंभव सा प्रतीत हो रहा था। दर्द जीवन में निरंतर रहे तो आदत हो जाती है परन्तु दर्द अपनों को हो तो घुटन बनने लगता है। अपनी पीड़ा को सहना अत्यंत सरल है परन्तु अपनों पर आयी विपदा आपको चैन नहीं आने देती। पीड़ा का रहस्य एक संवेदनशील विषय है शायद इसको कोई भी अनुभव नहीं करना चाहेगा परन्तु यह जीवन का अभिन्न अंग भी है इससे दूर कोई जा भी नहीं सकता। यह अगर इतना बड़ा सत्य है तो इसकी विवेचना हम अपने दैनिक जीवन में क्यों नहीं करते हैं ? क्यों हम अपने जीवन के इतने महत्वपूर्ण अंग पर स्वयं ही आंकलन करने से डरते हैं?
मानव निर्मित भौतिक सुविधाएँ एवं वस्तुओं के प्रति अपार प्रेम हमें स्वार्थी बनाने का प्रयत्न करता है परन्तु ईश्वरीय रचना से प्रेम हमें स्वयं को पहचानने का अवसर प्रदान करता है। दोनों ने ही निर्माण किया है परन्तु ईश्वरीय रचना से किया गया प्रेम हमें उसकी आत्मा से आत्मसाध करवाता है परन्तु मानव निर्माण हमें भौतिक सुख एवं व्यापार सिखाता है। दोनों का अंतर नगण्य है परन्तु भाव में अत्यधिक अंतर। मानव संरचना प्रेम के आधार पर की गयी यह मैं इसलिए कह सकता हूँ कि जब जब हममे प्रेम जन्म लेता है तो सृष्टि का निर्माण होता है परन्तु जब जब हममे द्वेष ईर्ष्या का जन्म होता है तो हमारी अंतरात्मा का विनाश होता है।
अपने अंदर उत्पन्न सृजनात्मक भावों को हमें एक लक्ष्य निर्धारित कर उस पर अविलम्ब कार्यरत होना चाहिए। जो रचनात्मकता ईश्वर हमारे अंदर समाहित कर रहे हैं वह सृजन का कारण बने। भावों में बहुत कुटिलता होती है यह पल पल अपना रंग रूप सब बदल देती है। विषम परिस्थितियों में अलग अलग भाव उत्पन्न होते हैं यदि सही समय पर सही भावों के साथ हम कार्यरत होते हैं तो निश्चय ही हम अपना सौंदर्यीकरण करते हैं इसके लिए सही गलत का बोध होना आवशयक है।
अत्यंत दुखी मन ईश्वर की संरचना समझने का सबसे उपयुक्त समय होता है यदि इस समय हम स्वयं पर विजय प्राप्त कर सही दिशा में कार्यरत होते हैं तो हमारे पास भटकाव का मार्ग ही नहीं होता और हम एक दिशा में कार्य करते चले जाते हैं। अपना सही आंकलन एवं सही मार्गदर्शन का सबसे उपयुक्त सयम यही होता है अतः स्वयं को इस समय पर सही मार्ग पर प्रसस्त करें।
जीवन एक गहरा अध्ययन है इसका अध्ययन हम अपनी अंतिम साँस तक भी पूर्ण नहीं कर पाते। हम अपने ज्ञान के आधार पर ही अपनी धारणा बनाते एवं अपने शब्दों के चयन से उसे व्यक्त करते हैं परन्तु यह सत्य नहीं कि हमारी धारणा एवं शब्दों में समानता हो। धारणा अच्छी है लेकिन शब्द हो सकता है कि अच्छे ना हों और शब्द अच्छे हों परन्तु धारणा अच्छी ना हो दोनों का समन्वय बनाना ही हमारे जीवन की प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए। यही हमारे सुख और दुखों का सार भी है।
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