मेरा दर्द मेरी तन्हाई (Poem)



 

 तुम और मैं याद  है कहाँ मिले थे, 

कहाँ हमने वो अनकहे से एहसास, एक दूजे से कहे थे, 

तुम थोड़ी शर्मायी सी थी मैं थोड़ा घबराया सा था, 

फिर भी ना  जाने क्यों तुम पर, बहुत प्यार आया था, 

भीगी सी थी मेरी ऑंखें तुमने भी खूब साथ दिया, 

कन्धा जो  तुमने आगे  किया, तुम्हे  तो भीगना ही था, 

उस सर्दी की रात में  अश्रु तुम पर बरसा कर, 

रो रो कर पागल था मैं और तुम चुप करवा कर, 

ना  उस दिन कोई चाँद दिखा ना  तारे  थे  शायद,

तन्हाइयों में  वक़्त बिताने के यही फायदे थे शायद, 

तुम ना  होती तो अश्रु धारा निकलती नहीं, 

जितनी बर्फ दिल में  जमी थी वो पिघलती नहीं, 

बोझ खुद की गलतियों का लिए घूमता हर जगह, 

अश्रु बहने से दर्द, चलो कुछ कम तो हुआ, 

यूँ ही आ जाया कर कभी कभी इस मैल को धोने के लिए , 

जहर जो बन रहा है दिल में , उसमे प्यार के बीज बोने के लिए , 

तुझसे दूर होना भी जरुरी है मेरे लिए, 

हर पल पास रखूँगा तो रौनक कहाँ होगी चेहरे में,

दर्द तो बस तुझे दिखता  है मेरे सीने में,

ज़माने को क्या फर्क पड़ता है मेरे ऐंसे जीने में,

ज़माने के लिए चेहरे पर थोड़ा हंसी लानी पड़ती है,

बस इसीलिए तुझसे थोड़ी दूरी बनानी पड़ती है, 

पर तू वो किताब है ज़िंदगी की जिसे हर पल पढ़ना  है मैंने, 

तेरे दम पर ही तो इतना किया है, और आगे बढ़ना भी हैं मैंने, 

ये कोई और नहीं मैं और मेरी तन्हाई है ,

ना  ये कभी मुझसे जुदा हुई, और ना  मुझे कर पायी है, 

ज़माने की ठोकरों ने मुझे खूब बातें सिखाई हैं ,

इसीलिए मेरे दर्द की साथी सिर्फ मेरी तन्हाई है। 

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