अब नी करा पलायन (Poem)(भाषा गढ़वाली)
बचपन खूब छौ मेरु सभी सच्चा दगड़्या वखि छा,
निर्भगी ह्वेगी जवानी मेरी अब सिर्फ पेंसा ही पेंसा ह्वेयुं चा,
नि रौंदा हम यन जुगत माँ, नि पोड़दा तब तैं उमर माँ,
त रौंदा हम आज वीं माटी माँ, वी सुबेर माँ वी बिनसिर माँ,
कख हर्चि होला उ दिन, उ रात भी आज कखि नि चा,
उ पहाड़ भी कखि नि छन, व रस्याण भी कखि नि चा,
कख होलु मौसी कु गौं कु बाठु, कख व हरियाली हर्चि चा,
कख होला उ दगड़्या जो रोन्दी दा भी हँसे देंदा छा, और हेसन माँ लोड जांदा छा,
उ प्यार अजक्याल रयुं नि कखि, ना यु संसार उइ चा,
चला प्यारों फिर वखि चलदान जख बटी सुरुवात कई चा,
व ख़ुशी कखि नी च दगड्यों जु पहाड़ों माँ समाई चा,
नि होलु इथ्गा पेंसा पर ख़ुशी त तब भी वखि चा,
बिन्सरी माँ उठी की, सिन्कोली नींद त औंदी चा ,
घोर उबरों माँ कम से कम ठण्ड त रोंदी चा,
गुठ्यार भी तनी होया होला तिबारी भी घिसी सी,
चला प्यारों आंदा इबरी तो सब्युं लिपी की,
आज नी त भोल जान सब्युन वखि च,
अबेर किलै कन्न तब जब प्राण हमरु वखि च,
जर जोर जमीन माटू सभी हमरु वखि च,
पुरखयूं को दियुं कोदा जौ कु आटु भी वखि च,
जौं का फांगा लोन्फैंकी उनका हडगा बचपन माँ तोड्या छन,
अब नि करदा हम यन जुलम अफरा पहाडुं पै,
चलदान घोर उठे की हॉल जोत देंदा बांजी पगडयुं तें ,
बाणोंदा जंगल लगोदा डाला प्राण देंदा बाँझ बुरांसुन तें,
पानी पेंदा तोँ डालियुंकू आर ओ कु पानी छोड़ी तैं,
समों अभी सही होयुं लोलोन सभी बेरोजगार होया छन,
जब सभी नयु ही कन त चला प्यारों वखि किले नी कन,
गीत भी तुम बिसरिगे होला भाषा बोलन त छोडियाली,
देवभूमि बोल्दन इ तेँ, तब तुम भी बोल्या मी भी छौं पहाड़ी।
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