बन ताकत खुद की खुद से (Poem)
रख संघर्ष को अपनी मुठ्ठी में ,
बन ताकत खुद की खुद से ,
बन हक़ीक़त इस दुनिया की ,
नाम रोशन जहाँ में कर दे ,
न यकीन कर दुनिया पर ,
खुद को ही हक़ीक़त समझ ले ,
जो अतीत हो गया है उसको ,
अपने जीवन का अनुभव समझ ले ,
बन दुनिया का वो सितारा यहाँ ,
जिसकी तलाश सब करते हैं ,
उड़ना चाहो तो उड़ जाओ बस ,
इरादे थोड़ा मजबूत कर ले ,
ये आसमा भी तुम्हारा है ,
ये ज़मीन भी तुम्हारी है ,
ये समंदर भी तुम्हारा है और ,
ये लहरे भी तुम्हारी है ,
रख संघर्ष को अपनी मुठ्ठी में ,
बन ताकत खुद की खुद से।
ना दर्द कोई यूँ दे सकता ,
ना कोई यूँ ही हमें सह सकता,
ना परवाह कर इस जहाँ की अब ,
चल कहीं दूर जहाँ सुकून हो बस,
तू उठ वहां से अब, जहाँ तू गिरा है ,
मजिल है तेरी लेकिन, सपना बिखरा है ,
संभल अब देर ना कर उसे पाने में,
ना सोच अब पल भर भी पैर ज़माने में ,
जो गिर कर संभलेगा खुद, वही यहाँ महाराणा होगा ,
घास की रोटी खा कर भी, विजय पताका फहराना होगा ,
ना कर विश्वास, समय को लुटाने में ,
रख संघर्ष को अब, अपनी मुठ्ठी में ,
जीवन जीने का यही रहस्य है। आपकी कविता बहुत प्रेरणादायक है गुरुवर।
जवाब देंहटाएंआपका हृदय से आभार। सही तो यह है कि आप गुरु हैं जिन्होंने इस रूप में पुनर्स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त किया है। नमन है आपको।
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