रक्षात्मक या आक्रामक
अनुभव से प्राप्त ज्ञान आवश्यक नहीं कि स्वयं के अनुभवों से ही ग्रहण किया जाये कभी कभी हम यह सब दूसरों के अनुभवों से भी ग्रहण कर सकते हैं। सामान्यतः हमारे आस पास ऐसी घटनाएं घटती हैं जिनका हमसे सम्बन्ध नहीं होता परन्तु वह हमें कुछ ना कुछ सिखा देती हैं अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उन सब से क्या सीख पाते हैं। आज का समय बहुत व्यस्त होने के साथ साथ बहुमुखी प्रतिभावान होने का भी है परन्तु हम इसमें लगातार निष्क्रिय होते चले जा रहें हैं स्वाभाविक है कि यह सब हमारी आदतों में हो रहे बदलावों की भिनंता एवं तीव्र तरह से बदलते हमारे निर्णयों का परिणाम है। देखा जाये तो हमारा व्यव्हार आक्रामक एवं कार्य रक्षात्मक हैं जबकि हमें इसके विपरीत होना चाहिए। हमारे कार्य आक्रामक एवं व्यव्हार रक्षात्मक होना चाहिए।
हम जीवन में बहुत सारी गलतियां करते हैं और यह लगभग सभी से होती हैं परन्तु गलतियों को दर्पण समझने वाले निर्णय तक जल्दी पहुँच जाते हैं ठीक इसके विपरीत गलतियां ना स्वीकार करने वाले लोग उस एक गलती को सही साबित करने के चक्कर में अपना बहुत समय बर्बाद कर देते हैं। यह भी एक बड़ा कारण हमारे कार्य में रक्षात्मक होने का है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
हमें सदियों से कर्म प्रधान होने का ज्ञान दिया गया कर्म प्रधान होकर ही हम अनुभव प्राप्त भी कर सकते हैं और दूसरों के अनुभव का लाभ भी उठा सकते हैं परन्तु अचानक कर्म के लिए हमारी इन्द्रियां इतनी निष्क्रिय क्यों हो गयी हैं कि ज्ञान और कर्म कि कमी हम अपने आस पास अत्यधिक देखते हैं। अब इसके दो कारण बहुत स्पष्ट हैं पहला यह कि हमारे अंदर ज्ञान और कर्म की कमी है इसलिए हमने आस पास के वातावरण का चयन भी ऐसा ही किया है दूसरा कारण यह जो कि ना के बराबर ही संभव है कि कर्म से फल की प्राप्ति नहीं होती आप इनमे से क्या सोचते हैं आपके उत्तर की प्रतीक्षा मैं कमेंट में देखना चाहूंगा।
Ati sundar vichar
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