मैं धरना प्रदर्शन हूँ। (Poem)
मैं राजनितिक गलियारे से पैदा हुआ एक ऐसा हथियार हूँ
जो यदा कदा अपने उद्द्देश्यों को परिवर्तित करता हूँ।
सामाजिक भावनाओं का मजाक बना राजनीती मैं करता हूँ
कभी विरोध करने की तीव्र इच्छा तो
कभी समर्थन करता हूँ ।
थाली का बैंगन हूँ साहब कहीं भी पलट सकता हूँ
मैं धरना प्रदर्शन हूँ मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
न कोई रोक है मुझे यहाँ, न ही किसी से डरता हूँ।
मैं वो हूँ, जो कह देता हूँ वो करता हूँ।
समाज को साथ लेकर फलता फूलता हूँ
और फिर उसी समाज का विरोध करता हूँ।
स्वयं को फलीभूत करता हुआ आज मैं
तीव्रगामी दर्द निवारक से तुलना करता हूँ
मैं मन चाहा रूप बदल सकता हूँ।
आंसू बहा कर लोगों के सामने
कमरे में जाकर हँसता हूँ
मैं धरना प्रदर्शन हूँ साहब मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
राजनीती है मोह हमारा नेताओं की बात करता हूँ
बहुत बनाये नेता यहाँ इंसान बनाने से डरता हूँ
भूख बेरोजगारी है यहाँ भाषणों में मात्र कहता हूँ
मेरी जेब भरने तो दो एक बार
सब सुविधाओं के लिए तो मरता हूँ
मुझको एक बार बनने दो नेता ख्याल तुम्हारा रखूँगा
जेब भरेगी मेरी तो फिर कुछ फ्री मैं करता हूँ
सब व्यस्त हैं अपने जीवन में कोई परिवर्तन नहीं समझता
तुम ना संविधान जानते हो ना कानून
इसका मुझे भरपूर फायदा मिलता
सत्ताओं का खेल निराला कभी भी पलट सकता हूँ
मैं धरना प्रदर्शन हूँ साहब मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
तुमने झूठ फरेब सुने होंगे आज ये सब मैं करता हूँ
मैं चाहूँ तो जीवन छीन लूँ , मृत्यु भी दान मैं करता हूँ।
मैं तिरंगे का बिना रोक टोक अपमान भी करता हूँ।
तुम विरोध करो तो एक बार शहर वीरान भी करता हूँ।
मिला देता हूँ सब खाक में मैं हैरान भी करता हूँ
मिटा कर हस्ती तुम्हारी फिर तुम्ही पर एहसान भी करता हूँ
युगों युगों तक आग जले जो ऐसे काम भी करता हूँ
मैं धरना प्रदर्शन हूँ साहब मैं कुछ भी कर सकता हूँ।

बहुत ही उत्तम रचना।
जवाब देंहटाएंसहृदय आभार श्रीमान
हटाएंBahut sundar Ashish ji
जवाब देंहटाएंTHANKYOU SIR
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