नारी सशक्तिकरण



                                        कन्याओं को पूजने वाला यह भारत वर्ष यदि नारी सशक्तिकरण की बात करता है तो यहाँ सबको यह सोचने की आवश्यकता है कि जिस देश में नारी पहले से ही सशक्त है वहां उसको कमजोर दिखा कर हम सिद्ध क्या करना चाहते हैं।  यह हमारी मानसिकता का परिचय है और यह मानसिकता यह सिद्ध करती है कि हम सब की सोच में एक ग्रहण लगा है जिसको खत्म करना ही होगा। यहाँ इस देश में लाखों महिलाएं आज एक उदाहरण है। यह बात चाहे हम किसी भी सदी की करें महिलाओं के योगदान के बिना सृष्टि की रचना की परिकल्पना करना भी असंभव है फिर यह सशक्ति करण की आवश्यकता कहाँ से लगने लगी। 

                                     आप सब जब यह प्रश्न स्वयं से करेंगे की आपकी घर की महिलाओं में क्षमता नहीं है तो इस का उत्तर आपको स्वयं मिल जायेगा और आपका उत्तर भी यही होगा कि हमारे घर कि महिलाएं स्वयं में सक्षम हैं फिर जब आप सभी का यह उत्तर है तो यह सोच कहाँ से आयी कि नारी सशक्त नहीं है? 

                                         यह सोच उन लोगों का बोया बीज है जो नारी की स्वतंत्रता से ईष्या करते हैं अगर सही कहूं तो यह सबसे बड़ा झूठ भारत वर्ष का है कि नारी यहाँ सशक्त नहीं है। जिसने भी यह किया  वह जनता था कि भारत वर्ष की संस्कृति का प्रभाव इतना अधिक है कि यहाँ की नारी किसी भी परिस्थिति में सबसे अधिक धैर्य रखकर उससे बाहर निकल सकती है और यही एक कारण है कि यहाँ यह बीज बोया गया तांकि यहाँ की नारियां इस सशक्तिकरण के जाल में फंस कर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए अपना अस्तित्व ही भूल जाएँ। यह मेरी व्यक्तिगत सोच हो सकती है परन्तु अगर आप सब भी विचार करेंगे तो यह आप अपने घर की महिलाओं की कार्य क्षमता से निर्धारित कर सकते हैं। आपको यह बात सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होगी। 

                                 अब विचार करते हैं कि इस सशक्तिकरण की सही शब्दों में कैसे व्याख्या करें।  यदि हम सोचें तो यह एक गंभीर विषय है सही कहूं तो नारियों के लिए सम्मान में कमी है अब यदि सम्मान ही नहीं है तो सशक्तिकरण की आवश्यकता किसको है महिलाओं को या पुरुषों को।  महिलाएं पहले से सशक्त हैं बस उन लोगों के विचारों को बदलना आवश्यक है जिनके पास महिलाओं के लिए सम्मान नहीं। 

                                       सम्मान एक ऐसा विषय है कि जिसने भी मन में सम्मान का भाव जागृत कर लिया वह सम्पूर्ण जीवन में कुंठित नहीं रह सकता। आज के इस समय में मात्र सम्मान की कमी है यदि हम एक दूसरे का सम्मान करें तो हमें कभी किसी को सशक्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हमारी सबसे बड़ी भूल पश्चिमी सभ्यता के लिए भागना है और यही सभ्यता हमारे मध्य भावनात्मक रिश्तों को काम वासना की तरफ ले कर जा रही। हमें अपने भावनात्मक रिश्तों को प्रबल कर अपनी क्षमताओं को पहचानना होगा क्यूंकि यदि नारियों को कमजोर कर दिया गया तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर क्षीण होती चली जाएगी और यह नारियों के प्रति सम्मान के भाव से ही संभव है। अपने घर की नारियों के प्रति सम्मान का भाव सब चाहते हैं परन्तु यही भाव दूसरे के घरों की नारियों के प्रति नहीं रहता। यह भाव सही करना महिला एवं पुरुष दोनों का उत्तरदायित्व है। 

                                             आजकल प्रायः यह देखा जा सकता है कि यह समस्याएं विकराल रूप लेती जा रही है परन्तु कोई भी इन विषयों पर चर्चा या इनके समाधान हेतु सोचना नहीं चाहता सभी एक दूसरे की गलतियों पर ही विचार करते हैं परन्तु यदि हम मात्र अपने द्वारा किये गए कृत्य पर विचार करेंगे तो समस्या का निराकरण अगले ही क्षण संभव है। समाधान के प्रति सचेत रहना हमारा उत्तरदायित्व है जबकि हम इससे अधिक सचेत गलतियों को ढूंढने में होते हैं।  पारस्परिक सद्भाव और चेतना बढ़ाना पारिवारिक उत्तरदायित्व है जिसको पूर्ण नहीं किया जा रहा। दुखी होने पर सरल मार्ग जैसे नशा, काम वासना इनकी तरफ भागने से अधिक आवश्यकता आध्यात्म की तरफ भागना सीखना होगा। 

                                        विचारों की शुद्धता साधना से ही संभव है। साधना सम्मान के भाव से पैदा होती है। सम्मान के भाव को पैदा करने हेतु हमें एक दूसरे से बात करनी होगी।  परिवार में अपनी उपस्थिति सदैव रखें।  एक दूसरे का साथ दें एवं अपनों के लिए हर परिस्थिति में खड़े रहें। 

                                           आशा है कि आज के सन्दर्भ में कही गयी यह बातें आपको समझ में आयी होंगी। मुझे खुल कर कहने कि आवश्यकता नहीं क्यूंकि आप सभी समझदार हैं।  अपने गंदे विचारों को किस प्रकार समाप्त करके सम्मान के भाव को कैसे पैदा करना हैं यह हमें स्वयं सुनिश्चित करना हैं। हर रिश्ते का महत्त्व समझकर हमें ही सामाजिक परिवेश को व्यवस्थित करना हैं यह निर्णय आज ही ले लें।  


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