आध्यात्म

 







                     वैसे तो आध्यात्म पर बहुत बड़ा लेख लिखा जा सकता है क्यूंकि आध्यात्म जीवन की वह प्रक्रिया है जो हमें मोह माया से परे होने के पश्यात प्राप्त होती है तो जीवन के मोह से लेकर आध्यात्म तक के मार्ग  पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है परन्तु यहाँ हमारे जीवन की घटनाओं से ही हम अनुभव प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। 

                   अब जीवन की बात आ रही तो पहले जीवन से सुरु करते हैं।  जब भी एक नवजीवन जन्म लेता है तो माता पिता उसके मोह में कैद हो जाते है। 

                 अब समझते है कि प्रेम की जगह मोह ने कैसे ले ली ? इसके लिए प्रेम और मोह का अंतर समझना आवश्यक हैं। 

                    मोह हमें दूसरों पर अपेक्षा करना सिखाता है यदि हम किसी का कोई कार्य कर रहे हैं तो हम उससे अपेक्षा करते हैं कि उस कार्य के बदले वह भी हमारे लिए कुछ करेगा यानि स्वार्थ पैदा हुआ तो मोह अपने आप आ गया। जब नवजात शिशु जन्म लेता है तो उससे अपेक्षाएं वही से सुरु हो जाती हैं नवजात शिशु डॉक्टर बनेगा या कुछ और , कौन से विद्यालय में पढ़ेगा ? नवजात शिशु को इंग्लिश का ज्ञान करवाना है या विदेशी विद्यालयों में ज्ञानार्जन करवाना है, जैसे जैसे वह नवजात बड़ा होता चला जाता है हमारी अपेक्षाएं उससे बढ़ती चली जाती हैं। हम कब माता पिता के दायित्व से भटक जाते हैं यह हमें स्वयं से ज्ञात नहीं हो पाता।  हम उसे अधिक धन कैसे कमाना है यह सिखवने का पूर्ण प्रयत्न करते है तांकि वह हमारे भविष्य जिसको हम बुढ़ापा कहते हैं उसको सुरक्षित कर सकें। बच्चे वही करें जो आप चाहे तो यह मोह से अधिक कुछ नहीं। 

                       श्रीमदभगवत गीता में भगवान वासुदेव कहते हैं कि जो पिता और माता बच्चे के चरित्र निर्माण पर कार्य करते हैं उनके बच्चे पूरे विश्व में ख्याति प्राप्त कर माता पिता का मान बढ़ाते हैं अतः बच्चे से मोह से नहीं अपितु उसके चरित्र निर्माण पर कार्य करने का मार्ग ही आध्यात्म है। 


अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य: |

स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: ||

                   वे मनुष्य जो कर्मफल की कामना से रहित होकर अपने नियत कर्मों का पालन करते हैं वे वास्तव में संन्यासी और योगी होते हैं, न कि वे जो अग्निहोत्र यज्ञ संपन्न नहीं करते अर्थात अग्नि नहीं जलाते और शारीरिक कर्म नहीं करते। 

                    अर्थात अपने कर्मफल प्राप्ति की इच्छा ना रखते हुई कर्तव्य कर्म करना आवश्यक है।  जो अपने कर्म को कर्तव्य कर्म समझ कर कार्य करते हैं उन्हें कर्मफल प्राप्ति की कामना नहीं होती। यह कहा जा सकता हैं कि हमें अपने कर्म को कर्तव्य समझ कर करना चाहिए तांकि उसमे मोह उत्पन्न ना हो और यही कर्मयोगी कहलाते हैं।  यह भी आध्यात्म का एक मार्ग है।  


              निसंदेह इस मार्ग में बहुत बाधाएँ है परन्तु मन को वश में करने के पश्यात इच्छाएं नष्ट हो जाती हैं इच्छाओं की समाप्ति के पश्यात मोह की समाप्ति, कर्तव्य कर्म का मार्ग एवं अंत में हम सत्य को प्राप्त करते हैं जिसे ईश्वर कहते हैं। यह पूरा मार्ग ही आध्यात्म है।  


                मन को अपने अधीन करने वाले लोग ही आध्यात्म का सही विवरण दे सकते हैं अर्थात अपनी इन्द्रियों को वश में करने का जो मार्ग हैं वही आध्यात्म कहलाता है।



आशीष भट्ट 

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