सेक्युलर

 






यह मेरे द्वारा रात्रि को देखा गया एक स्वप्न हैं जिसका विस्तार पूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। इसमें किसी जाती  धर्म मजहब का कोई लेना देना नहीं हैं।  स्वप्न प्रारम्भ से अंत तक स्वप्नं के अनुसार ही प्रस्तुत किया गया हैं अतः इसकी परिकल्पना आप भी मात्र स्वप्नं समझ कर ही करें। 



आज का लेख उन सेक्युलर हिंदुओं को समर्पित है जिन्हे समय और सच्चाई से कोई मतलब नहीं इसलिए आज के लेख में बहुत अधिक कठिन शब्दों का प्रयोग भी नहीं करूँगा।  आते हैं आज के मुद्दे पर। 

वो कौन  से सेक्युलर हैं भाई जिन्हे  यह अब भी समझ नहीं आ रहा कि इस्लामिक आतंकवाद को इस्लामिक आतंकवाद ही कहना चाहिए, और क्यों नहीं समझ आ रहा, यह मैं नहीं समझ पा रहा।  अब चाहे सदियों का इतिहास उठा लो, या आज को ही देख लो मानसिकता में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है सारी समस्याएं वही हैं, और इरादे भी वही हैं, फिर कहाँ हमारी शिक्षा हमें ऐंसे नालायक दे रही है, वह कौन सी शिक्षा है जिसे ग्रहण करने के बाद भी हम सच्चाई से बहुत दूर हैं, कहीं हमारी शिक्षा का एक बड़ा भाग वह चाटुकार तो नहीं खा गए, जिन्हे इस देश की शिक्षा एवं यहाँ के इंसानो की संतुष्टि से द्वेष है। आइये थोड़े फैक्ट आपको बताता हूँ, सब थोड़ा थोड़ा बताता हूँ परन्तु आज की स्थिति पर गहराई से लिखूंगा बाकी का इतिहास आप कहीं भी पढ़ सकते हैं। 

महर्षि कश्यप के नाम से प्रचलित कश्मीर हिन्दू और बौद्ध संस्कृति का एक बहुत बड़ा गढ़ रहा, अब अगर कश्मीर को हम महर्षि कश्यप के साथ सुनते हैं तो अकारण ही आज के कश्मीर पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। यह मेरा व्यक्तिगत कथन नहीं बल्कि इसके लिए आप मध्ययुग का और उससे पहले का इतिहास पढ़ लीजिये आपको सब समझ आ जायेगा। मध्ययुग के बाद इस्लामिक शासकों द्वारा ऐसा क्या किया गया, जिसने कश्मीर का इतना इतिहास परिवर्तित कर दिया, आज हम यह समझते हैं कि कश्मीर तो मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है वहां हिन्दू नहीं रह सकता। १९९० का नसंहार और पलायन के साक्षी आप भी होंगे। 

अब यदि कश्मीर का इतिहास आपको सेक्युलर बनाये रखता है तो इसमें किसका दोष ?

आते हैं दूसरी बात पर 

मोपला कांड, बहुत कम लोग इसके बारे में जानते होंगे, परन्तु यह ढूंढ कर पढ़िए जरूर कि कितने हिन्दुओं का नरसंहार यहाँ हुआ था और किसके द्वारा किया गया था।  इसने केरल के धार्मिक अनुपात को बिलकुल उल्टा कर दिया।  कम से कम ५० लाख से ऊपर हिन्दुओं का नरसंहार हुआ था यही नहीं आप इसके बारे में इंटरनेट पर ढूंढने जायेंगे  तो यह आपको मिलेगा भी बहुत मुश्किल से क्यूंकि सच आसानी से यहाँ मिल जाता तो, बाहर  के लोग हम पर हुकूमत कहाँ कर पाते।

 लेकिन अब भी हम सेक्युलर हैं तो किसका दोष है ?

तीसरी बात 

द एक्शन डे।  इसका इतिहास भी बहुत बड़ा है आप सब लोग पढियेगा जरूर लेकिन यह भी आपको कितना सच मिलेगा इंटरनेट पर यह बताना थोड़ा कठिन है, बस जो उसके द्वारा में आपको बताना चाहता हूँ वही लिख रहा हूँ।  जब एक्शन डे में मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं का नरसंहार किया जा रहा था तब वो यह नहीं देख रहे थे कि यह हमारा मित्र है, यह हमारे मित्र की बहन है, रेप जुल्म और मौत का वो मंजर वही समझ सकता था जो वहां था, हर तरफ हिन्दुओं  को चुन चुन कर मारा जा रहा था, महिलाओं का बलात्कार हो रहा था, उसके बाद उनको तलवारों से काट दिया जा रहा था।  जो महिलाएं पेट से थी उनको पेट से दो टुकड़ों में किया जा रहा था तांकि पेट में पल रहा बच्चा भी वहीँ दो टुकड़े हो जाये।  कलकत्ता ही कलकत्ता में लगफग सवा लाख हिन्दू नरसंहार हुआ।  इसके बाद यह आग पूरे देश में फैलने लगी और सब जगह यही होने लगा। फिर एक नाम, या कहें एक शेर आया गोपाल मुखर्जी या इनको  गोपाल पाठा भी कहते थे इन्होने हिन्दुओं के नरसंहार पर अपना रौद्र रूप दिखाया, लेकिन इतिहास की किताबों से गायब कर दिए गए। आज जो बंगाल बचा है ना, वो गोपाल जी को आदर्श मान रहे हिन्दुओं की वजह से ही बचा है।  अब कुछ दलाल इस पर भी सवाल खड़ा करते हैं कि मुस्लिम भी मरे थे, तो मुस्लिम मरने की सच्चाई भी आपको गोपाल जी को पढ़ने के बाद ही पता चलेगी। इन्होने १ हिन्दू की मौत पर कम से कम २० मुस्लिम मारे।  हमारी वीरता ने इनको मारा, ये मरे नहीं।  गाँधी ने जो हथियार हिन्दुओं से फिंकवाए उनकी भूमिका यहाँ भी बहुत संदेह वाली रही। इनको पढ़ो तो समझ आये,

 लेकिन फिर भी हम सेक्युलर हैं तो किसका दोष है ?

चौथी बात 

१९४७ भारत पाकिस्तान विभाजन इसका तो इतिहास पूरा का पूरा आसानी से उपलब्ध है यहाँ हिन्दुओं के नरसंहार की गणनाएं बहुत कम जगह हैं,परन्तु फिर भी इस नरसंहार में मुस्लिमों की भूमिका पढ़िए। भगाया हिन्दुओं को गया, मुस्लिम तो यहीं रह गया, जिनको राजनीती करनी थी वो चले गए उस पार और भारत की गद्दी पर, बाकी हिन्दू पर सेक्युलर होने का भूत था तो मारा गया। सबसे बड़ा नरसंहार था ये और इसकी चर्चा मैंने कभी किसी किताब में पढाई करते हुए नहीं पढ़ी और ना ही इस पर सार्वजानिक रूप से बात होती है।  कम से कम १२ लाख से ऊपर हिन्दुओं का नरसहार हुआ लेकिन फिर भी 

हम सेक्युलर हैं तो दोष किसका हैं ?

ये कुछ प्रमुख घटनाएं थी इसके अलावा भी 370 35A को किस तरह लाया गया, कश्मीर में लगातार नरसंहार, लाल बहादुर शास्त्री जी की हत्या और उनका इतिहास ही ना होना , इमरजेंसी ,१९८४ सिक्ख दंगा, 1990 कश्मीर , गोधरा बहुत ऐंसी घटनाएं हैं जिनका उद्देश्य हिन्दुओं का नरसंहार ही था। 

फिर भी हम सेक्युलर हैं तो किसका दोष हैं?

अब जिन्होंने ये दौर देखा और पढ़ा हैं, वो तो ठीक जिन्होंने नहीं देखा उन्हें आज उस स्थिति का आभास करवाता हूँ दिल्ली दंगों से। 

दिल्ली दंगों में क्या हुआ हर जगह हिन्दू को निशाना बनाया गया, ताहिर हुसैन की छत पर पेट्रोल बोम गुलेल सबने देखी। उनका इरादा सबको समझ आया, लेकिन सोचो कि क्या था।  अब जिनको इसमें साजिस नहीं नजर आती वह यह बात अवश्य बताएं कि, पत्थर, पेट्रोल बोम का इतना स्टॉक क्यों किया था ? अगर सारे मुस्लिम इसमें शामिल नहीं थे तो स्कूल से अपनों बच्चों को लेने छुट्टी से पहले ही क्यों गए और केवल मुस्लिम ही क्यों गए ? हिन्दुओं की दुकाने ही क्यों जलाई गयी बगल वाली मुस्लिम की दुकान क्यों छोड़ दी गयी ?  दुकानों के बाहर मजहबी चिन्ह क्यों बनाये गए थे ? दिलवर नेगी को  इतनी बेरहमी से क्यों मारा गया ? अंकित शर्मा जैसे कितने लोग मार कर नाले में फेंके गए ? दंगों में मुस्लिम की भूमिका ही क्यों इतनी अहम् होती हैं ? आतंकवादी केवल मुस्लिम ही क्यों होता हैं ? मुस्लिम महिलाएं इतने अत्याचारों के बाद भी चुप हैं इसका क्या कारण हैं ?

बहुत ऐसे सवाल हैं जो आप तभी करेंगे, जब आपके आस पास यह घटनाएं होंगी, जब आपकी बहन को घसीट कर कमरे में ले जायेंगे और बाहर दो टुकड़ों में लाएंगे। 

इसके बाद भी यदि हम सेक्युलर को किसका दोष ?

रामनवमी शोभायात्रा पर पत्थर फेंकना यह तो सिद्ध करता हैं कि हमारे नेतृत्व ने कीड़ों की दवाई सही फेंकी हैं, परन्तु बिलबिलाते हुए कीड़े यदि दर्द करें तो उन्हें हाथ से मसलना कोई बुरी बात नहीं। हम तलवारों के बाद भी पत्थर खा कर चुपचाप वापस आ रहे, इस पर प्रश्नचिन्ह लगता हैं, शांतिप्रिय समुदाय इसी शांतिप्रियता का पूर्ण रूप से लाभ ले रहा।  अतः पढ़ो और जागो, यही मत रुको फिर बच्चों को पढ़ाओ उनको भी जगाओ, आज यदि परिश्रम करोगे तो आने वाली पीढ़ियां फल खा पाएंगी। नहीं तो नरसंहार कब तक और कहाँ तक चलेगा, इसका अनुमान लगा पाना संभव नहीं। इनको जड़ से खत्म करो, क्यूंकि मानसिकता किताब नहीं खत्म होने देगी, और यह विशेष रूप से याद रहे कि संस्कारों का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता हैं, महापुरुषों को पढ़ाओ और पढ़ो, विभाजन करवाने वाले नीच को नहीं। उनकी मानसिकता में सुधार ना होने का प्रमाण यह हैं कि वो आपको लाउड स्पीकर से ५ बार हर दिन सुनाते हैं कि उनके अलावा इस पृथ्वी पर कोई नहीं।  वो आपके साथ यही करेंगे, पेलेंगे, क्यूंकि वो यही सुनते हैं उनकी इस आज़ादी को भी खत्म करो। अपना परचम पुनः लहराओ,  क्यूंकि भारत ही वह भूमि हैं जहाँ हर माँ दुर्गा से लेकर काली तक बन सकती हैं, इसी भूमि पर राणा जी आते हैं, यहीं मराठाओं की वीर गाथा हैं।  बस कम शब्दों में अत्यधिक समझने का प्रयास करें।  

जय श्रीराम।  हर हर महादेव। 

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