संस्कृति एवं राष्ट्रवाद का प्रभाव

                           


   बात बहुत पुरानी है हम सब मित्रगण बैठ कर संवाद कर रहे थे।  संवाद का विषय राष्ट्रगान था ये वो समय था जब हम बहुत छोटे थे और इतिहास के नाम पर सिर्फ अकबर औरंगजेब और मुग़ल शासन काल के अलावा कुछ और नहीं पता था तो उस समय की राष्ट्रगान पर चर्चा हमें उसकी गहराई का अंदेशा भी ना था।  इस प्रसंग की शुरुवात तब हुए जब रेडियो में राष्ट्रगान बजा और सभी एक दम से खड़े होकर राष्ट्रगान को सम्मान देने लगे।  सभी के दिलों में  उस समय राष्ट्रवाद का जो ज्वार भाटा था वह मुखमण्डल पर प्रतीत हो रहा था।  राष्ट्रगान खत्म हुआ और उस विषय पर चर्चा शुरू हुई।  सभी सम्मानित मित्रगण अपनी अपनी भावनाएं प्रस्तुत करने लगे सभी एक अलग जोश में थे और देश समर्पित बातों का बहुत भीषण उबाल आया हुआ था।  पाकिस्तान से ख़राब रिश्तों के चलते सब देश पर मर मिटने की बातें कर रहे थे। भावनाओ में आकर एक मित्रगण की आँखों से आंसू भी टपकने लगे।  सभी ने उसको चुप करवाते हुए उस गहन वार्तालाप में अपने समय के लगफग दो घंटे व्यतीत कर लिए जिनका उस समय के माहौल में पता ही नहीं चला उन भावनाओ का उधम और पराक्रम रोंगटे खड़े देने वाला था।  मातृभूमि के लिए सोचना ही उस असीमित आनंद की अनुभूति करवा रहा था जिसे हम अपने जीवन में सदैव देखना चाहते थे। संसार में हर मानव एक दिव्य शक्ति पर विश्वास करता है।  वह दिव्य शक्ति उसके जीवन में कोई भी हो सकती है परन्तु देश के लिए कुछ करने की सोच मानव को एक नया रूप प्रदान करती है।  यह संसार के सम्पूर्ण मानव जाति के साथ होता है।  किसी भी देश को बनाने हेतु कुछ ही बातें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं जिसमे संस्कृति, सभ्यता एवं राष्ट्रवाद सर्वोपरि भूमिका निभाते  हैं और यही तीनो भाव उस समय हम सभी साथियों के मन में थे जो कि एक अलग आनंद की अनुभूति हैं।  मैं यह पूर्ण विश्वास से कह सकता हूँ कि संसार का कोई भी व्यक्ति जो अपना स्वार्थ सिद्ध किये बिना अपने देश एवं संसार के हित में कार्यरत रहता हैं वह जीवन के उस परम आनंद को अवश्य प्राप्त करता है। उस समय इन विषयों पर चर्चा करते हुए हम सभी मित्रगणों ने यह  कभी नहीं सोचा था कि अभी बहुत से अनुभव ऐंसे हैं जिनकी अभी हमें कोई जानकारियां नहीं।  समय अपनी गति से अग्रसर रहा और हमने बहुत ऐंसे कार्य भी देखे जो हम उस समय अपनी कल्पनाओ में भी नहीं सोच पाते। 


                   बचपन में हमारा इतिहास सिर्फ मुगलकाल के राजाओं की तारीफ में ही बीत गया मानो हमारे देश की सारी संस्कृति यहीं से शुरू और खत्म हुई हो।  हमें इस देश के लिए किस तरह कार्य करके इसकी अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से दिशा देने हेतु कोई भी ज्ञान उपलब्ध नहीं था।  इंटरनेट, कंप्यूटर, मोबाइल के लिए सोचना तो बहुत दूर की बात थी शायद उस समय सभी के साथ ही ऐंसा था परन्तु पाठ्यक्रम में भी कुछ ऐंसा नहीं था जिससे हम अपनी संस्कृति से जुड़े रहें एवं इसकी महानता  के बारे में पढ़ें।  कई लोगों का सवाल यह होगा कि इस बारे में पढ़ कर क्या लाभ होगा तो मुझे यह भी नहीं समझ आया कि अकबर औरंगजेब के बारे में पढ़ कर क्या लाभ हुआ।  लाभ और हानि दोनों ही ऐंसी प्रक्रिया हैं जिन्हे हम स्वयं के स्वार्थों से जोड़ कर देखते हैं।  संस्कृति हमें अपने देश से जोड़ती है और देश हमें किसी ना किसी रूप में लाभान्वित करता है।  जापान जिस पर परमाणु बम गिरने के बाद भी वह देश जिस गति से आगे बढ़ रहा है वह उस देश के लोगों के समर्पण और देश पर निष्ठा का भाव व्यक्त करता है।  लोगों से उनका देश होता है और देश लोगों की सोच से ही चलता एवं खत्म होता है।  

                                बेनेजुएला का इतिहास पढ़ा तो समझ आया कि हमारी सोच करने वाली होनी चाहिए ना कि आराम से बैठ कर खाने वाली होनी चाहिए।  यदि हमें सब कुछ मुफ्त मिल जाये तो हमारी  कार्य करने की क्षमता बाधित होती है हमें यदि देश को खुशहाल  एवं समृद्ध करना है तो हमें अपनी उत्पादक क्षमता को बढ़ाना पड़ेगा यानि हर व्यक्ति को उत्पादक होना पड़ेगा।  हमें उन उत्पादों के समानांतर ढूंढने होने जिनकी हमारे देश आवश्यकता तो है परन्तु उनका उत्पादन नहीं है हमें उन उत्पादों पर उत्पादन क्षमता को बढ़ाना होगा। 

                                हमारे देश में जनसँख्या  एवं संशाधनो के बीच का अनुपात लगातार बढ़ रहा है जो कि एक गंभीर  विषय है इन सब चीज़ों के बारे में सोचना हम सबका कर्तव्य है यदि आज हम जनसँख्या नियंत्रण  पर सोचें तो इसका लाभ  हमें दस साल बाद देखने को मिलेगा इसलिए हमें आज ही इन सब विषयों पर गंभीर होकर कार्य करने होंगे तांकि जनसँख्या और संशाधनो का अनुपात व्यवस्थित किया जा सके। 

                                 एक देश एक कानून (यूनिफार्म सिविल कोड ) भी सामान नागरिकता हेतु अति आवश्यक है यदि हम सभी इस देश के नागरिक हैं तो कानून में भेद भाव की कोई गुंजाईश नहीं होनी चाहिए। अभी मैं इन तथ्यों को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ इन पर विस्तृत चर्चा आने वाले लेखों में करूँगा। 

                            हमारे देश में कानून सबके लिए सामान होना अति आवश्यक है क्यूंकि यदि हम सरकारों से यह मांग करते हैं कि सरकार देश से गरीबी एवं अच्छा उत्पादक क्षमता का बनाये तो हमें हर उस कानून का विरोध करना चाहिए जिससे हम परस्पर अलग होने कि अनुभूति करते हैं। 

                            मैं यह कह सकता हूँ जाति, पाति, धर्म, पंथ, मजहब इन सबको विशेष दर्जा हमारा कानून देता है।  इनको विशेष बनाने हेतु जितने भी कानून बनाये गए हैं मैं उनका समर्थन नहीं करता। देश की पहचान उसकी संस्कृति से होती हैं और इस देश की पहचान मुग़ल और अंग्रेज नहीं हो सकते।  यह सनातन भूमि है और इसकी पहचान मात्र भारत माँ ही हो सकती है।

                           अब मुझे यह समझ आ रहा था कि हमारा बचपन कितना भोला भाला था शायद हम उस समय यह सब बातें समझ ही नहीं पाए कि देश राज्यों से मिलकर बनता है, राज्य जिलों से मिलकर बनते हैं, जिले ब्लॉक से मिलकर बनते हैं, ब्लॉक गाँउ से और गाँउ लोगों से मिलकर कर बनता है और सरकार लोग बनती है।  यानि शुरुवात भी लोग हैं और अंत भी लोग। इस देश का इतिहास पहले से ही विवादित रहा है चाहे देश का विभाजन धार्मिक आधार रहा  हो या समस्याएं भी धार्मिक रही हों।  यहाँ ऐसे नेतृत्व की हमेशा कमी रही जिसने इस देश को इसकी संस्कृति के आधार पर अग्रसर करने की कोशिश की हो। बहुसंख्यक समाज के सोये होने के कारण लगातार ही संस्कृति का दोहन होता रहा और कानून विशेष धार्मिक आधार  पर बनने लगे जो की देश की संस्कृति को लगातार आघात करने लगे। एक समाज के सोये होने के कारण यहाँ स्वामी विवेकानंद भी होने बंद हो गए जो समाज में जागृति पैदा कर सके। साधु समाज जो हमारे देश की व्यवस्था में एक आधारभूत भूमिका निभाते थे उन्होंने अपना अपना रास्ता अलग अलग बना लिया जो इनमे से अछि विचारधारा वाले थे उन्होंने सोये हुई समाज की वजह से अपना स्थान हिमालय की पर्वत श्रेणियों को बना लिया और हमारे धर्म और संस्कृति की पहचान करने वाले सिर्फ वो लोग बचे जिन्होंने सदैव ही हमें भ्रमित किया।  अब एक बार फिर वह देश प्रेम लौटते हुई देख पा रहा हूँ इस समाज का हर वर्ग जाग रहा है।  बस यह जरूर ध्यान  रखें कि सारी शक्ति आप लोगों के हाथ में है इसका सदुपयोग करना है या सोये रहना है यह  आप पर  निर्भर  करता  है।  आप चाहें तो आर्थिक आधार पर झुका सकते हैं या संख्या के आधार पर बस कानून वही बने जो भेदभाव ना पैदा करे।  संशाधन कम हैं और जनसख्याँ का  अनुपात सुधारने कि अति आवश्यकता है इसलिए सुनिश्चित करें कि आप अपना योगदान कैंसे देंगे। 


                                     धार्मिक आधार पर आज़ादी के बाद से ही देश चला है और चलता रहता यदि इस समय आपका वोट अलग  जगह ना पड़ा होता इसलिए अपने वोट एवं आर्थिक मजबूती की पहचान कर देश के लिए ऐसे नेतृत्व का निर्माण हमेशा करते रहें जिनका उद्देश्य देश सेवा से हट कर ना हो तभी यह देश समृद्ध बन सकता है। 

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