संडे फीवर एवं उन्नत्ति दिवस
मेरे मामाजी देहरादून से आये थे तो उनसे वार्तालाप हो रहा था बहुत बातें होने के बाद उनकी दिनचर्या का एक अंश मुझे बहुत पसंद आया उन्होंने मुझे छोटे से शब्द में बता दिया लेकिन जब मैंने उस बारे में सोचा तो वह एक ऐसा विषय था जिसका सम्बन्ध हर व्यक्ति से है। तो आइये उस गहरे विषय पर हम भी अध्ययन करते हैं उसने वार्तालाप में शब्द निकल कर आया जो था संडे फीवर।
अब आप भी सोचेंगे कि संडे फीवर तो लगभग हर कोई जानता होगा तो इसमें नया क्या है ? जब आप सुनेगे तो हैरान रह जायेंगे कि यह तो पूर्ण रूप से ही नया है। अब बात करते हैं उस नएपन की। अधिकतर लोग संडे को छुट्टी करते हैं या छुट्टी होती है तो स्वाभाविक है कि संडे को हमारा मस्तिष्क इस परिवर्तन के लिए पूर्ण रूप से तैयार रहता है हम या तो संडे को सोकर या घूम कर बिताने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। इस दिन आलस्य की चरम सीमा पर हमारा शरीर होता है संडे मतलब छुट्टी। अब सोचिये १ महीने के चार संडे ४ संडे मतलब ९६ घंटे। अब इसमें सोने के ३० घंटे हटा देते हैं तो बचे ६६ घंटे सिर्फ १ महीने में हम ये सोच कर बिता देते हैं कि आज छुट्टी है। इतना बड़ा विश्वास घात हम स्वयं के साथ कैसे कर सकते हैं ?
अब इसको समझने की कोशिश करते हैं कि ऐसा होता क्यों है ? हमारी पूर्व मानसिकता हमें यह करने के लिए प्रेरित करती है यदि हम अपनी मानसिकता को किसी भी बिंदु पर स्थिर कर देते हैं तो अधिकत्तर हमारे साथ यही होता है कि हमारा शरीर और ऊर्जा भी उस कार्य को करने हेतु हमें प्रेरित करती रहती है। किसी भी बात के लिए हमारी पूर्व मानसिकता कभी कभी हमें बहुत कुछ सीखने से रोक सकती हैं अतः इसका ध्यान रखें कि हमारी पूर्व मानसिकता मात्र उन्ही बातों के लिए हो जिनसे हमें लाभ अर्जित हो। उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं किसी वाद विवाद में पूर्व मानसिकता हमें सुनने का अवसर प्रदान नहीं करती जिससे हम बहुत सारी बातों को सीखने से रह जाते हैं। ठीक इसके विपरीत हमारे द्वारा स्वयं को समय देने हेतु हमारी पूर्व मानसिकता हमारे समय को नष्ट होने से बचती है। अब इस बात का विश्लेषण हमें स्वयं करना होगा कि कहाँ हमारी पूर्व मानसिकता हमें लाभ दे सकती और कहाँ हानि पहुंचा सकती है। सबके साथ लाभ और हानि भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भिन्न भिन्न हो सकती हैं इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में सोच समझ कर पूर्व मानसिकता पर निर्भर रहने कि कोशिश करें। संडे एक सामान्य परिस्थिति हैं जो लगभग सबके साथ समानांतर रूप से रहती है इसलिए इसको समझा जा सकता है कि संसार में कई बातें ऐसी हैं जिन्होंने प्रचलित होकर हमारे मस्तिष्क अपनी जगह बना ली है हमें इन सब भ्रम पर अपनी आलस्य वाली आदत से अलग कुछ ऐसा सोचना होगा जिससे हम उस पूर्व मानसिकता को समाप्त कर सकें।
मामाजी से वार्तालाप में इस भ्रम की स्थिति को दूर करने हेतु उनका उपाय सुना तो समझ आया कि हम अपने मस्तिष्क का ०.१ % भी सदुपयोग नहीं करते उन्होंने बताया कि वह इस दिन को संडे के स्थान पर उन्नत्ति दिवस से सम्बोधित करते हैं जिससे उनके अंदर उस दिन हेतु एक नई ऊर्जा का संचालन होता है जो कि वह पहले अनुभव नहीं करते थे।
अब इतना समझ आ गया था कि जो हम जन्म से देखते आ रहे हैं वह सामाजिक नियमावली समाज के अनुरूप हो सकती है परन्तु उसका सकारात्मक उपयोग कैंसे करना है यह हमें सुनिश्चित करना पड़ता है। हमें अपनी व्यवस्थाओं पर स्वयं के लिए सकरात्मकता का सृजन करना होगा क्यूंकि हमारा समय हमारे लिए किस प्रकार से लाभप्रद हो सकता है यह हमसे उत्तम और कोई और सुनिश्चित नहीं कर सकता अतः स्वयं पर विश्वास करके स्वयं के कार्यों का आंकलन करें और लाभान्वित होने वाले कार्यों में अपनी रूचि बनायें। अब यह भी सुनिश्चित करें आपके द्वारा अर्जित ज्ञान उन्ही को दें जो आपके इस विषय पर चिंतन करने की चेष्टा रखता हो क्यूंकि आपके द्वारा अर्जित किया गया ज्ञान आपकी परिस्थिति पर पूर्णतया निर्भर करता है , हो सकता है सामने वाला व्यक्ति आपकी परिस्थितियों से सम्बन्ध ना रखता हो और अपने नकारात्मक तथ्यों से आपकी सकारत्मक ऊर्जा का हनन कर सकता है इसलिए स्वयं के समय के लिए सदैव स्वयं को प्रोत्साहित करते रहें।
आपके उज्जवल भविष्य एवं सुखद जीवन की मंगल कामना के साथ।
आशीष भट्ट
सेल्स हेड - सेलब्लेस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड
सदस्य - शिवालिक उत्तरांचल विकास समिति

Very nicely written
जवाब देंहटाएंthankyou sir
हटाएंGreat going
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