धर्मनिरपेक्षता एवं अकारण द्वेष
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण , विशाल एवं संवेदनशील विषय है। धर्मनिपेक्षता का सही भावार्थ सर्व धर्म सदभाव एवं सर्व धर्म सम्मान। पहले इसको समझते हैं कि हमारे मूल संविधान में धर्मनिरपेक्ष आया कहाँ से कब आया और इसकी आवश्यकता मात्र स्वार्थ सिद्ध करना था या कुछ और।
हमारे संविधान में लिखा जो लिखा गया है वह " हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक ,न्याय , विचार , अभिव्यक्ति , विश्वास , धर्म और उपासना कि स्वतंत्रता , प्रतिष्ठा और अवसर कि समता प्राप्त करवाने के लिए तथा उनमे व्यक्ति कि गरिमा और राष्ट्र कि एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ ( मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी सम्वत २००६ विक्रमी ) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं "।
इसमें कुछ शब्दावली में परिवर्तन किया गया जिसके कुछ परिवर्तन में आपको बता रहा हूँ। प्रभुत्व सम्पन लोकतान्त्रिक गणराज्य की जगह प्रभुत्व सम्पन समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य ने जगह ले ली और राष्ट्र की एकता की जगह राष्ट्र की एक और अखंडता शब्द आ गए।
यह परिवर्तन सदैव ही विवादास्पत रहा है यह १९७६ से ही विवादों में रहने वाला विषय है। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता पहले से ही थी धारा १४ देश के नागरिकों को एक समान होने का प्रावधान देती है। धारा १५ धर्म जाती नस्ल लिंग और जन्म स्थल के आधार पर भेदभाव करने से रोकती है तो जब हमारा संविधान इतना अधिकार पहले से ही देता है तो इस परिवर्तन का आशय समझ से बाहर है। जिस वस्तु की आवश्यकता न हो यदि वस्तु का प्रारंभिक रूप यदि पहले से हो तो उसकी आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए। उसके बाद व्यवस्थाओं में कई रूप के नकारात्मक परिवर्तनों ने जन्म लिया। इसके पश्यात धर्म और जाति समूहों के रूप में सामजिक विघटन पैदा हुए। डॉक्टर अम्बेडकर के अनुसार प्रस्तावना सविधान के सभी चारित्रिक लक्षणों को संहित करती है। फिर भी ४२ वें संसोधन में प्रस्तावना में परिवर्तन एक गंभीर स्थिति की तरफ इशारा कर रही थी जिसका सही अनुमान कोई नहीं लगा पाया। यह तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की प्रबल राजैतिक इच्छा एवं अल्पसंख्यकों को लाभान्वित करने मात्र का उद्देश्य ही था क्यूंकि बहुसंखयकों के लिए ज्यादातर कानून उनकी धार्मिक मान्यताओं एवं संथाओं के लिए ही कठोर थे। इसमें कई भेद निकल कर आये जिनमे समान नागरिकता संहिता कानून का ना होना और मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक पर चल रहा कानून विशेष रूप से प्रभावी थे।
आर सी कपूर , माधवराज सिंधिया और गोलक नाथ केस में सर्वोच्च न्यायलय ने सरकार के विरुद्ध फैसला सुनाया था जो कि बैंको के राष्ट्रीकरण , रियासतों को दिए जाने पैंसे एवं मूल अधिकार के संसोधन को लेकर थे। तब प्रधानमंत्री का पद श्रीमती इंदिरा गाँधी के पास था उन्होंने संविधान में अपने ढंग से परिवर्तन कर सर्वोच्च न्यायलय के इन फैसलों को निरस्त कर दिया था। वह ऐसे कार्यों से अपने कार्यकाल के समय अत्यधिक चर्चित भी रही।
विषय के मूल में आते हैं आज के सन्दर्भ में देखा जाये तो धर्मनिरपेक्ष शब्द हमारी प्रस्तावना में होना ही नहीं चाहिए था। हमारी संस्कृति और सभ्यता ही हमारी पहचान का मूल कारण थी जो कि धर्मनिरपेक्ष के बाद खोती नज़र आयी। निरंतर हमारी संस्कृति पर आघात किये गए और आज तक किये जा रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए मनमोहन सिंह जी कहते हैं कि देश के संशाधनो पर पहला हक़ मुस्लिमों का है क्या यह धर्मनिरपेक्ष था ? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मुलायम सिंह जी मुस्लिम हमारी बेटियां हैं क्या यह धर्मनिरपेक्ष था ? कई बार ऐसे वक्तव्य दिए गए जो उचित नहीं थे परन्तु एक जाति विशेष के हित में थे तो वह धर्मनिरपेक्ष थे और यह सबने मान भी लिया। अल्पसंखयकों के लिए बहुसंख्यकों को बंधी बनाना कितना उचित है ?
अब मैं आपको कुछ तथाकथित स्वयं को अभिनेता कहने वाले लोगों के द्वारा कहे गए विशेष शब्दों को बताता हूँ।
आमिर खान -
असहिष्णुता वाह क्या शब्द है और आश्चर्य करने वाली बात यह है कि यह वह कह रहा है जिसकी फिल्मों को ३०० -४०० करोड़ का व्यवसाय हम लोग देते हैं। एक ऐसा इंसान जो हमारे द्वारा दी गयी सफलता के भरोसे है और जो सुरक्षा के बीच रहता है। वो इंसान जो देवी देवताओं पर आपत्ति जनक फिल्मे बनाता है वह कहता है कि देश असहिष्णु हो गया है। क्यों इसका क्या कारण हो सकता है ? कहीं यह उन ताकतों का खरीदा गया नुमाइंदा तो नहीं जो इस देश को विकसित नहीं देखना चाहते। कहीं यह पेंसे लेकर दिया गया बयान तो नहीं ? हम क्यों इन पर विश्वास कर इनको व्यवसाय दें। ये देश हित की बात करते हैं जिनकी फिल्म को देखने हेतु ३००-४०० रुपये खर्च करने पड़ते हैं। सत्यमेव जयते नामक नाटक में गरीबों के मसीहा बन कर आये उन सामाजिक मुद्दों को उठाया जो गलत हैं लेकिन समाज के लिए किया क्या है। क्या कभी इन्होने उन मुद्दों पर बात की कि आज हमारे वेद शास्त्रों पर जो खोज हो रही है ब्रह्माण्ड कि ऊर्जा जिस पर काफी खोज की गयी और जो मनु स्मृति से लिया गया है क्या कभी उस पर कार्यकर्म बनाये। नहीं ये संभव नहीं क्यूंकि यहाँ वेद शास्त्र जुड़े हैं। ये आपको सिर्फ देश के विरुद्ध बातें कह कर आपकी मानसिकता को भारत विरोधी बनाने की बात करते हैं यह आपके मन में सिर्फ नकारात्मक बातों को भर कर आपको देश के बारे में नकारात्मक सोच रखने का निमंत्रण दे रहे है ।
शाहरुख़ खान -
अगर मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे तो मैं देश छोड़ दूंगा। इनकी औकात नहीं देश छोड़ने की क्यूंकि जो इनको यहाँ से ,मिला है वो किसी और देश में नहीं मिलेगा ये बात ये भी जानते हैं। इन लोगों को फिल्मे हिट होने का इतना अभिमान हो गया की अपने बयानों से यह चाहते हैं हमारे फैन हमारी इच्छा से वोट करे। सारी चाबियाँ इनके हाथ में हो ये सत्ता अपने अनुरूप कभी भी पलट सकें। ये बहुत बड़ी साजिस हैं जो पटल पर आने से पहले ही धराशायी हो गई।
नसीरुद्दीन साह -
इनके हिसाब से भी देश में अराजकता का माहौल है। ये लोग यह भी भूल गए कि इस देश और यहाँ के लोगों ने इनको दिया क्या है। अब से पहले यह लोग अराजक थे वाह नहीं दिखाई दिया अचानक आज अराजकता नज़र आने लगी। सबसे बड़ी बात कि हर चीज़ से सम्पन इंसान यह बात कह रहे हैं। यह उन लोगों के दिमाग में इन बातों को भर रहे हैं जो इनके धर्म से सम्बन्ध रखता हो तो अगर दूसरे धर्म के लोगों के दिमाग में भी यह बातें आ रही तो आपत्ति क्यों ?
पूर्वउपराष्ट्रपति हामिद अंसारी -
वो फ़िल्मी सितारे थे ठीक ये तो संवैधानिक पदों पर रहें हैं। मुस्लिम असुरक्षित फिर भी है। अपने १० साल के कार्यकाल में इन्हे ऐंसा नहीं लगा लेकिन अंतिम १४ दिन में इन्होने असुरक्षित महसूस करना शुरू कर दिया। उपराष्ट्रपति से पहले भी यह संवैधानिक पदों पर विराजमान रहे तो सोचिये जिनकी मानसिकता ऐसी हो उन्होंने जो भारत का प्रचार किया होगा वह क्या किया होगा। कोरोना काल में यह एक किताब लिखते हैं जिसमे यह भारत द्वारा दिए गए सम्मान की बात नहीं करते बल्कि यह उसमे ऐसे तथ्यों को शामिल करते हैं जिससे भारत की नकारात्मक छवि बने। अब यह ये समझ गए हैं कि इससे ज्यादा स्वार्थ मैं यहाँ सिद्ध नहीं कर सकता तो अब नकारात्मक तथ्यों से समाज को भ्रमित करते हैं। लोगों को आपस में लड़वाने का सबसे बड़ा श्रेय इन्ही लोगों को जाता है क्यूंकि यही सारी नकारत्मकता लोगों के बीच पहुंचाते हैं।
ऐसे बहुत सारे बयान हैं ये ४ इसलिए इस सूची मैं क्यूंकि इनको लगभग सभी जानते होंगे। इन श्रेणी में हिन्दुओं के बयान भी है परन्तु जब एक हिन्दू गलत बयान देता है तो उसका विरोध स्वयं हिन्दू कर देता है ।
अब अगर ऐंसा धर्मनिरपेक्ष देश चाहता है कांग्रेस तो मुझे नहीं चाहिए। जब हमारे देश का विभाजन ही धार्मिक आधार पर हुआ तो हम धर्मनिरपेक्ष क्यों ? हाँ यह मैं नहीं चाहता की किसी भी धर्म के खिलाफ कोई कुछ कहे लेकिन हिन्दू राष्ट्र में रहने से दिक्कत क्यों ? समस्या इसलिए है कि हिन्दू राष्ट्र बनते ही संविधान में हिन्दू हितों हेतु परिवर्तन होंगे जैसे मंदिरों का संरक्षण , शिक्षा पद्धति में बदलाव जो कि अभी धारा २५ ,२६ ,२७, २८, २९ ,३०, के मानकों की विवश्ता में नहीं हो सकते। अब समझने की आवश्यकता है कि हम लोग सहिष्णु न होते तो १९४७ मे धार्मिक आधार पर विभाजन हुआ और हम चुप रहे। १९५४ में संविधान में कश्मीर की धारा ३७० के साथ ३५ ए जोड़ा गया हम चुप रहे। हरित क्रांति और स्वेत क्रांति लाने वाले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की हत्या पर चुप रहे। सर्वोच्च न्यायलय से लगातार हारती प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आपातकाल पर चुप रहे। शाहबानो केस में सर्वोच्च न्यायलय के फैसले के खिलाफ राजीव गाँधी का अपना कानून फिर भी हम चुप रहे। इंदिरा गाँधी को जेल से छुड़ाने हेतु विमान अपहरण फिर भी हम चुप रहे। सत्ता की हनक को सभी करने हेतु और अपना अस्तित्व बनाने के लिए विमान अपहरण कर्ताओं को विधायकी का टिकट दिया फिर भी हम चुप रहे। लगातार सर्वोच्च न्यायलय की हार से बोखलाए हुए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में परिवर्तन फिर भी हम चुप रहे। पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई में मंदिर होने के साक्ष्य फिर भी हम चुप रहे। सिखों का नरसंहार फिर भी हम चुप रहे। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जहाँ हम चुप रहे लेकिन अब नहीं क्यूंकि अब पाप का घड़ा भर गया है। अब हम चुप रहे तो आने वाली पीढ़ियों को क्या जबाब देंगे। वो कहेंगे कि हमारे पूर्वज नपुंसक थे जो कि उन लोगों का विश्वास कर रहे थे जिनके पास ५६ इस्लामिक देश पहले से थे। वो लोग धर्मनिरपेक्ष की बात कर रहे थे जो स्वयं धर्मनिरपेक्ष नहीं थे और हमारे पूर्वजों ने कुछ नहीं किया हाथ पर हाथ धरे बैठे थे।
इसलिए आप सबसे यही आग्रह करता हूँ कि अब वो समय समाप्त हो गया है जब हम चुपचाप सुनते थे। अब समय है हर उस बात का उत्तर देने का जो देश हित में ना हो। हर उस कार्य का विरोध कीजिये जो देश के विरुद्ध हो। देश हित और देश विरुद्ध बातों का मानक तो नहीं तय है लेकिन एक धर्म के विरुद्ध प्रायोजित कार्यों का पूर्ण रूप से विरोध कर उन्हें हटाया जा सकता है। देश अल्संख्यकों का भी है परन्तु बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के लिए दबाया नहीं जा सकता। कोशिश कीजिये हामिद अंसारी जैसी सोच वाले लोग उन पदों पर ना पहुँच पाएं। कोशिश कीजिए जिन फ़िल्मी सितारों को हमने बनाया है उनको हम ही धूल में मिला दें। अगर वोट के माध्यम से हम शक्तिशाली किसी को बनायें तो वह हममे से कोई हो। भ्रमित एवं विचलित ना हों इस देश का वो इतिहास पढ़ें जो इस देश से सम्बन्ध रखता हो। जिस चिश्ती का इतिहास हिन्दुओं के लिए ख़राब रहा हो उसकी दरगाह पर सर पटकने से बढ़िया है कि अपने मंदिरों के संरक्षण के लिए आगे आएं। अपने मंदिरों को इतना बलवान बनायें कि वह लोगों का पेट भरने हेतु समर्थ हो सकें। वेद साश्त्रों को पढ़ें एवं आने वाली पीढ़ी को भी उस ज्ञान का भंडार प्रदान करें। उन पर विश्वास रखें। अल्प ज्ञान के भंवर में फंस कर उनके विरुद्ध चल रही बातों पर सर ना हिलाएं बल्कि पढ़ कर प्रतिउत्तर दें। अब लड़ाई लड़ने के तरीकों में बहुत परिवर्तन आएं है जिनमे से सोशल मीडिया वार एक बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा इसलिए अपने अनुभव और जानकारियां सबके साथ साँझा कर एवं देश की गरिमा को नुकसान पहुँचाने वाले तत्वों का पुरजोर विरोध करें। इसका ताज़ा उदाहरण मियां खलीफा पोर्न स्टार , ग्रेटा थुनबर्ग , एवं रिहाना के ट्वीट हैं जिनको भारत कि भौगोलिक स्थिति का नहीं पता वो तथाकथित किसानो के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं सोचिये कि इनको तो इनके ट्वीट का पैंसा मिल गया लेकिन जिन लोगों ने ये करवाया उनकी सोच विश्व स्तर पर भारत कि कौन सी छवि बनाने की है। इन सब मामलों पर एक होकर अपना विरोध दर्ज करें एवं आवश्यकता पड़ने पर सड़कों पर भी उतरे।
सरकार कोई भी आएगी वह अपने अनुरूप सत्ता में बदलाव करेगी जो इस सरकार ने भी किया यह हमेशा हुआ है और होता रहेगा। लेकिन जिनको हमने बहुमत देकर सत्ता में विराजमान किया है उनके विरोध में इतने अंधे ना होइए की हमारे वोट का अपमान भी करने लगें। इसलिए देश अगर धर्मनिरपेक्ष हैं तो वही बनकर रहना ही उचित है परन्तु यह धर्मिरपेक्षता सभी के लिए परस्पर समान होनी चाहिए। सत्ता का दुरुपयोग कोई भी करे वह उचित नहीं। विकास की नीतियां सबकी अपनी अपनी है उनको उन नीतियों पर काम करने दें। जिनको बहुमत में भेजा गया है इसका मतलब वो आज हमारी पसंद हैं और उनके विरुद्ध किये गए कार्य यानि हम पर भी संदेह करना है। इसलिए सुनिश्चित करें कि किसी के काम में कमी ढूंढने के बजाय अपने कार्यों को कार्यान्वित किया जाये। क्यूंकि इस पूरे ब्रह्माण्ड को चलने वाली ७ शक्तियां हैं जिनका आज तक कोई पता नहीं। इस विषय पर बहुत बड़े बड़े लेख बहुत लोगों ने लिखे हैं जरूर पढ़ें। नदी कि दिशा में तैरना सीखिए नदी के विरुद्ध तैर कर हम अपना अस्तित्व खत्म कर देते है। समाज के साथ चलिए चाहे इसमें कमियां हों या खूबियां और सफलता हेतु प्रयासरत रहिये।
आपके अच्छे स्वास्थ्य एवं विचारों की शुद्धता की मंगल कामना के साथ।
आशीष भट्ट
सेल्स हेड - सेलब्लेस हीथकेयर प्राइवेट लिमिटेड
सदस्य - शिवालिक उत्तरांचल विकास समिति

Sabhi padhen aur comment karen
जवाब देंहटाएंthankyou sir
हटाएंthankyou so much sir
जवाब देंहटाएंअति उत्तम
जवाब देंहटाएंधन्यवाद श्रीमान
हटाएंबहुत सही आंकलन है।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद श्रीमान
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