सकारात्मकता और नकारात्मकता

 सकारात्मकता और नकारात्मकता दोनों ही हमारी ज़िंदगी के लिए बहुत अदभुत और चमत्कारी बातें हैं । दोनों ही हमारी ज़िंदगी क़ि दिशा और दशा दोनों को ही पल भर में बदल सकती हैं।  इसका एक अच्छा उदाहरण मेरे साथ हुई एक घटना में है जिसका  विस्तार पूर्वक वर्णन शायद  उन दोनों पहलुओं को भली भांति समझाने में सफल हो पायेगा। 
कुछ दिन पहले क़ि घटना है हम कुछ लोग साथ बैठ बातें कर रहे थे इतने में कुछ लोग और आये और बातों का बना हुआ माहौल थोड़ा और तेज़ी से आगे बढ़ने लगा।  उनमे से एक मित्रगण के लिए बार्तालाप शुरू हुआ जो क़ि उनकी शारीरिक अवस्था के बारे में  थी।  सभी लोग उनसे उनकी जवानी का राज़ पूछने लगे और वो महानुभाव अपने अनुभव साँझा करने लगे।  उन्होंने अपने व्यायाम सम्बंधित एवं अपनी दिनचर्या, सबके साथ साँझा करना शुरू किया।  मैं  रोज़ की तरह एक कोने में बैठ सब सुन रहा था और सोच रहा था कि अगर ये महानुभाव इस उम्र में भी इतना व्यायाम और सकारात्मक ऊर्जा का संचयन कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते।  मैं अपने आप को प्रेरित करने के लिए स्वयं  को प्रोत्साहित करने लगा और उनकी बातों पर   चिंतन करने लगा। यह घटना मेरे मन में घट ही रही थी कि एक सज्जन ने उनसे कहा कि इस उम्र में आपको इतना वजन और इतना कठिन परिश्रम नहीं करना चाहिए और ज्यादा वजन एवं ज्यादा व्यायाम के दुष्परिणामों के बारे में बताने लगे। एकाएक मेरे मन में प्रेरणा बन रहे विचारों  पर काले बादल  मंडराने लगे और मेरा मन फिर से उसी अवस्था में जाने लगा जहाँ पहले से था।  वो महानुभाव चुपचाप उन दुष्परिणामों के बारे में सुनने लगे और उन पर कोई प्रतिक्रिया दिए बिना उस विषय पर मौन धारण कर लिया। विषय बदल गया और विषयों पर चर्चा शुरू हुई लेकिन मेरा मन उस विषय से हटे बिना उसकी गहराई में जाना चाहता था। 
अब मेरे मन की और मेरी वार्तालाप शुरू हुई जिसके कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
मन सोच रहा था की जो हुआ वो क्या था और थोड़ा व्याकुल भी था की जो नहीं होना चाहिए था वो हुआ।  अच्छे काम में भी बुराइयां निकाली जा सकती हैं वो भी उनके  द्वारा जिन्होंने उस अच्छे काम को कभी  किया ही नहीं। तब मेरे मस्तिष्क में एक विचार आया जो मानव के उचित और अनुचित व्यव्हार को स्पष्ट रूप देता है जो की निम्नवत है। 
हमारा व्यवहार दूसरों के लिए उस दिशा में प्रायोजित होता है जिस दिशा में हम हमेशा अपने आपको कमजोर महसूस करते हैं। कह सकते हैं कि हम अपनी उस विचारधारा को दूसरों पर डालने कि कोशिश करते हैं जिससे हम खुद  ही दुखी होते हैं क्यूंकि हम उस अवस्था में अकेले नहीं  रहना चाहते और उस अवस्था के लिए किसी और का साथ ढूंढते हैं लेकिन इसका सही तरीका अपनी उस अवस्था का बदलाव है जिसको हम स्वयं स्वीकार नहीं करते।
मानवीय व्यव्हार अधिकांशतय यह प्रदर्शित करता है कि हम अपने द्वारा किये गए गलत कार्यों में किसी और की उपस्थिति के लिए लोगों को उस कार्य हेतु प्रेरित करने का पूर्ण प्रयास करते हैं।  ये हमारी उस कार्य हेतु नकारात्मक सोच को प्रदर्शित करता है। परन्तु यदि किसी और की जगह अगर हम वहां अपने किसी घर के सदस्य की उपस्थिति को प्रायोजित करें तो जो उससे सोच निकल कर आएगी उस सोच को सकारात्मक सोच कहा जा सकता है क्यूंकि अधिकांश समय देखा गया है कि अपने घर के सदस्यों हेतु सोच नकारात्मक नहीं होती।
इन दोनों बिंदुओं पर अगर गौर करेंगे तो हमें पता चलता है कि अगर सोच हमेशा सकारात्मक चाहिए तो हमें उन सभी व्यक्तियों को अपना परिवार समझना पड़ेगा जो हमसे जुड़ते हैं। 
                               नकारात्मक सोच मात्र स्वयं कि क्षमता पर संदेह पैदा कर सकती है।
अब थोड़ा इस विश्लेषण को कहानी के बिंदुओं से समझने कि कोशिश करते हैं व्यायाम करना नुकसानदेह नहीं हो सकता हाँ ये कम या ज्यादा परिस्थिति पर निर्भर करता है।  हमें वहां खुद को व्यायाम के लिए प्रेरित करना चाहिए था लेकिन उस एक नकारात्मक बात ने कितने  मजबूत होते मन और मासिकता पर प्रभाव डाला इसका आंकलन स्वयं करें।  
हो सकता है हमारी नकारात्मक सोच बहुत लोगों के  आगे बढ़ते हुए जीवन में एक स्थिरता पैदा कर दे अतः स्वयं भी नकारात्मकता से दूर रहें एवं नकारात्मक बातों का आज से ही परित्याग कर दें। 
जो हमने पिछले ब्लॉग मानसिक तनाव एवं अवसाद के बारे में बताया है वो भी नकारात्मक सोच का एक अहम् हिस्सा है।  यही नकारात्मक सोच तनाव एवं अवसाद जो जन्म देती है। 

आपके  मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य की मंगल कामना के साथ आपका अपना। 

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